यह पाठ "श्लोक-अन्त्याक्षरी" नामक एक रोचक खेल के माध्यम से विद्या-विषयक सुभाषितों का संकलन प्रस्तुत करता है। वर्षा के कारण बाहर न जा पाने पर छात्र भीतर ही दो दल (ज्ञानमाला तथा रत्नमाला) बनाकर अन्त्याक्षरी खेलते हैं — एक दल जो श्लोक गाता है, उसके अन्तिम व्यञ्जनवर्ण से दूसरा दल अगला श्लोक आरम्भ करता है। इस प्रकार दस विद्या-विषयक श्लोक आते हैं, जिनके भावार्थ दिए गए हैं। प्रमुख सन्देश हैं — रूप, यौवन तथा कुल होने पर भी विद्या के बिना मनुष्य गन्धहीन पलाश-पुष्प के समान शोभाहीन है; बुद्धिमानों का समय काव्य-शास्त्र में और मूर्खों का व्यसन-निद्रा-कलह में बीतता है; दुर्जन की विद्या विवाद के लिए तथा सज्जन की ज्ञान-दान-रक्षण के लिए होती है; विद्या-तप-दान-शील-गुण-धर्म रहित मनुष्य पृथ्वी पर भार हैं; विद्या मनुष्य का श्रेष्ठ सौन्दर्य तथा गुप्त धन है, विदेश में बन्धु तथा परम देवता है; धन-वस्त्र-पर्वतारोहण-विद्या ये सब धीरे-धीरे (शनैः शनैः) सिद्ध होते हैं; और विद्याधन सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि इसे चोर नहीं चुरा सकता, राजा नहीं छीन सकता, और बाँटने से यह बढ़ता ही है। पाठ "विद्या" शब्द के सब विभक्तिरूप भी सिखाता है।
The story in 6 beats
1वर्षा होने पर बालिकाएँ बाहर नहीं जातीं और घर में नई क्रीड़ा करने की बात करती हैं।
2दीपिका अन्त्याक्षरी क्रीड़ा का नाम बताती है और सब मिलकर क्रीड़ा करने को तैयार होते हैं।
3वे दो गण बनाती हैं, जिनके नाम ‘ज्ञानमाला’ और ‘रत्नमाला’ रखे जाते हैं।
4क्रीड़ा का नियम बताया जाता है कि एक दल श्लोक गाता है और दूसरा अन्तिम व्यञ्जन से नया श्लोक कहता है।
5ज्ञानमाला ‘र’ अक्षर से आरम्भ करती है और दोनों दल क्रम से विद्या-सम्बन्धी श्लोक कहते हैं।
6श्लोकों के माध्यम से विद्या की महिमा, सज्जनता, समय का सदुपयोग और विद्याधन की श्रेष्ठता प्रकट होती है।
श्लोक-अन्त्याक्षरी खेलविद्या-विषयक दस सुभाषितविद्या तथा विद्याधन की श्रेष्ठता"विद्या" शब्द के विभक्तिरूपषष्ठी विभक्ति तथा प्रश्ननिर्माण
Characters & key ideas
अअन्त्याक्षरीखेल जिसमें एक श्लोक के अन्तिम व्यञ्जनवर्ण से अगला श्लोक आरम्भ किया जाता है।
ककिंशुकाःपलाश/ढाक के पुष्प; सुन्दर पर गन्धहीन — विद्याहीन व्यक्ति की उपमा।
धधीमताम्बुद्धिमानों का; इनका समय काव्य-शास्त्र-विनोद में बीतता है।
वविद्याधनम्विद्यारूपी धन; न चोरी होता, न बँटता, बाँटने पर बढ़ता — सर्वधनप्रधान।
शशनैः शनैःधीरे-धीरे; पथ, कन्था, पर्वतलङ्घन, विद्या तथा वित्त — सब क्रमशः सधते हैं।
भभूषणम्आभूषण; "विद्या सर्वस्य भूषणम्" — विद्या सबका आभूषण है।
Word meanings · शब्दार्थ
निर्गन्धाः
गन्धहीन
किंशुकाः
पलाश के वृक्ष
धीमताम्
बुद्धिमान लोगों का
व्यसनेन
भोग-विलास से
परिपीडनाय
कष्ट देने के लिए
खलः
दुष्ट व्यक्ति
भारभूताः
भार स्वरूप
तत्त्वज्ञानम्
यथार्थ ज्ञान
प्रच्छन्नगुप्तम्
ढँका हुआ और सुरक्षित
विद्याविहीनः
विद्यारहित
ध्रुवम्
निश्चित
चोरहार्यम्
चोर द्वारा हरने योग्य
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वयम् अभ्यासं कुर्मः
परियोजनाकार्यम्
कार्यकलापः
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