यह पाठ ईसप की प्रसिद्ध "लोमड़ी और अंगूर" कथा का संस्कृत गीत-रूपान्तर है, जिसे अभिनय-सहित गाया जाता है। एक शृगाल (लोमड़ी) भूख तथा प्यास से व्याकुल होकर वन में जाता है, परन्तु उसे कुछ नहीं मिलता; वह थका-हारा तथा खिन्न होकर इधर-उधर देखता है। तभी उसे ऊपर एक द्राक्षालता (अंगूर की बेल) पर लटके अंगूर दिखते हैं और उन्हें देखकर उसके मुख में लार आ जाती है। वह एक बार, दो बार, तीन बार और बार-बार उछलता है, परन्तु अंगूर तक नहीं पहुँच पाता। अन्त में पसीने तथा श्रम से थककर वह यह कहता हुआ भाग जाता है कि "अंगूर खट्टे हैं" — अर्थात् जो वस्तु प्राप्य नहीं होती उसे लोग दोषपूर्ण कहकर अपना असफलता-दुःख छिपाते हैं। व्याकरण-दृष्टि से यह पाठ आत्मनेपदी धातुओं (जायते, लभते, पलायते, वन्दते, वर्धते, सेवते आदि) के लट्-लकार रूप सिखाता है — लभते, लभेते, लभन्ते इत्यादि।
शृगाल तथा द्राक्षाफल की कथा (गीत-रूप)असफलता को दोष बताने की मनोवृत्तिआत्मनेपदी धातु के लट्-लकार रूपपलायते/जायते/लभते जैसे क्रियापदअभिनय-सहित गायन
Characters & key ideas
शशृगालःलोमड़ी; कथा का मुख्य पात्र जो अंगूर खाना चाहता है पर पहुँच नहीं पाता।
पपिपासा-बुभुक्षापिपासा = प्यास (पीने की इच्छा), बुभुक्षा = भूख (खाने की इच्छा)।
दद्राक्षालताअंगूर की बेल; इसी पर लटके अंगूर शृगाल को दिखते हैं।
आआत्मनेपदी धातुजिनके लट्-लकार रूप ते-थे-न्ते आदि में होते हैं — लभते, जायते, पलायते।
पपलायतेभाग जाता है (आत्मनेपद); अन्त में शृगाल "आम्लं द्राक्षाफलम्" कहकर पलायते।
आआम्लम्खट्टा; अप्राप्य वस्तु को दोषपूर्ण बताकर असफलता छिपाने की मनोवृत्ति का प्रतीक।
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न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम्
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