ईशावास्यम् इदं सर्वम्
Class 7 Sanskrit · दीपकम् · Chapter 7
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The story in short
यह पाठ नाटक-रूप में प्रह्लाद-कथा के माध्यम से "ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है" यह उपनिषद्-सन्देश ("ईशावास्यम् इदं सर्वम्") समझाता है। अध्यापिका छात्रों को बताती हैं कि ईश्वर केवल मन्दिर में नहीं, अपितु वृक्ष-कक्षा-शिला-क्रीडाङ्गण — सर्वत्र है; इसी को बालक प्रह्लाद ने सिद्ध किया था। नाटक में दैत्यराज हिरण्यकशिपु स्वयं को सर्वशक्तिमान् तथा अमर मानता है और उसका अपना पुत्र प्रह्लाद ही उसका विरोधी बनता है क्योंकि वह निरन्तर "ॐ नमो नारायणाय" का जप करता है। हिरण्यकशिपु प्रह्लाद को गज से कुचलवाने, पर्वत-शिखर से गिराने तथा समुद्र में फेंकने का प्रयास करता है, पर नारायण की कृपा से प्रह्लाद बच जाता है। फिर बहन होलिका, जिसे अग्नि न जलाने का वरदान था, प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठती है — पर वरदान के दुरुपयोग के कारण होलिका स्वयं भस्म हो जाती है और प्रह्लाद बच जाता है। अन्त में हिरण्यकशिपु स्तम्भ तोड़ता है, जिससे नृसिंह प्रकट होकर सन्ध्या-काल में, देहली पर, अपने नखों से उसका वध करता है। पाठ तृतीया विभक्ति (उपकरण-अर्थ), सन्धि तथा लृट्-लकार (भविष्यत्काल) भी सिखाता है।


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