मीरा – पद — Class 10 Hindi
स्पर्श भाग-2 · Chapter 2
Visual story
Watch as story →CBSE Class 10 community
View all- Mathematics
- Science
- + 10 more
- 15 पाठ
- व्याकरण
- लेखन प्रारूप
- 17 पाठ
- व्याकरण
- लेखन प्रारूप
- History
- Economics
- + 2 more
- First Flight
- Footprints without Feet
- 70+ formulas and theorems
- Board-paper chapter counts
- 24 traps corrected
- Equations and formulas
- Book tables as charts
- Traps corrected
- HTML & CSS examples
- Protocol tables
- Cyber ethics
- 9 पाठ
- सन्धि-समास
- प्रत्यय
Chapter summary
Key ideas & terms
- मीराबाई
- कृष्ण-भक्ति की प्रसिद्ध संत-कवयित्री।
- अनन्य भक्ति
- किसी एक इष्ट के प्रति पूर्ण, एकनिष्ठ भक्ति।
- दासी भाव
- मीरा का स्वयं को कृष्ण की सेविका मानने का भाव।
- भक्त-वत्सलता
- कृष्ण का अपने भक्तों की रक्षा करने का गुण।
- कुल-लाज
- सांसारिक मर्यादा, जिसकी मीरा परवाह नहीं करतीं।
- समर्पण
- मीरा का कृष्ण के प्रति पूर्ण आत्म-समर्पण।
Extra questions & answers
मीरा कृष्ण से क्या प्रार्थना करती हैं?
कि वे उनकी पीड़ा हरें और जैसे अन्य भक्तों की रक्षा की, वैसे ही उनकी भी रक्षा करें।
मीरा ने कृष्ण की भक्त-रक्षा के कौन-से उदाहरण दिए हैं?
द्रौपदी की लाज बचाना, प्रह्लाद की रक्षा और गज (हाथी) को ग्राह से बचाना।
मीरा किसकी परवाह नहीं करतीं?
सांसारिक मर्यादाओं और कुल-लाज की; वे केवल कृष्ण-भक्ति में लीन रहती हैं।
मीरा कृष्ण की सेवा में क्या चाहती हैं?
कि वे दासी बनकर कृष्ण की सेवा करें और सदा उन्हें निहारती रहें।
मीराबाई किसकी भक्त थीं और स्वयं को क्या मानती थीं?
मीराबाई कृष्ण की अनन्य भक्त थीं और स्वयं को उनकी दासी मानती थीं।
मीरा कृष्ण से क्या प्रार्थना करती हैं?
वे प्रार्थना करती हैं कि कृष्ण उनकी पीड़ा हरें और जैसे अन्य भक्तों की रक्षा की, वैसे ही उनकी भी रक्षा करें।
मीरा ने कृष्ण की भक्त-रक्षा के कौन-से उदाहरण दिए हैं?
द्रौपदी की लाज बचाना, प्रह्लाद की रक्षा करना और गज (हाथी) को ग्राह से बचाना।
मीरा किसकी परवाह नहीं करतीं?
वे सांसारिक मर्यादा और कुल-लाज की परवाह नहीं करतीं और केवल कृष्ण-भक्ति में लीन रहती हैं।
मीरा कृष्ण की सेवा में क्या चाहती हैं?
वे दासी बनकर कृष्ण की सेवा करना और उन्हें सदा निहारते रहना चाहती हैं।
मीरा के पदों का मूल भाव क्या है?
कृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति, समर्पण और दिव्य प्रेम।


12


4
2

