यह प्रथम पाठ संस्कृत वर्णमाला का सम्पूर्ण परिचय देता है। पाठ बताता है कि वर्ण दो प्रकार के होते हैं — स्वर तथा व्यञ्जन। स्वरों का उच्चारण स्वतन्त्र रूप से होता है, जबकि व्यञ्जनों के उच्चारण में किसी स्वर (प्रायः "अ") की सहायता अपेक्षित होती है। स्वर भी दो प्रकार के हैं — समानाक्षर (अ, इ, उ आदि सामान्य स्वर) तथा सन्ध्यक्षर (ए, ऐ, ओ, औ — जो दो स्वरों की सन्धि से बनते हैं)। पाठ ह्रस्व-दीर्घ भेद, अनुनासिक स्वर, तथा व्यञ्जनों के चार भेद — स्पर्श (वर्ग्य), अन्तःस्थ, ऊष्म तथा अयोगवाह (अनुस्वार-विसर्ग) — समझाता है। स्पर्श व्यञ्जन उच्चारण-स्थान के अनुसार पाँच वर्गों (क-वर्ग से प-वर्ग) में विभक्त हैं। व्यञ्जन तथा स्वरों के संयोग से गुणिताक्षर (मात्रा-संयुक्त अक्षर) बनते हैं। पाठ का योग्यता-विस्तार भाग पाणिनीय शिक्षा के अनुसार वर्णों के छह उच्चारण-स्थान (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका) तथा द्विस्थानीय वर्णों का वैज्ञानिक विवरण देता है। चाष-काक-मयूर-नकुल की ध्वनियों से ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत-अर्धमात्रा का रोचक उदाहरण भी दिया गया है।
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1पाठः वर्णानां द्विविधं रूपं बतलाता है—स्वराः तथा व्यञ्जनानि।
2स्वराः समानाक्षर, सन्ध्यक्षर और अनुनासिक-स्वररूपेण दिखाए जाते हैं।
3व्यञ्जनानां उच्चारणे अ-स्वरस्य सहायता बताकर उनके भेद और वर्ग दिए जाते हैं।
4व्यञ्जनैः सह स्वराणां योगेन गुणिताक्षराणि और अयोगवाहौ वर्णौ समझाए जाते हैं।
5शब्दार्थ, चित्राभ्यास, नामलेखन और वर्ण-समूहों के अभ्यास विद्यार्थियों से कराए जाते हैं।
6अन्ते वर्णानाम् उच्चारण-स्थानानि, द्विस्थानीय-वर्णाः और पाणिनीय-शिक्षा-सूत्राणि समझाए जाते हैं।
स्वर तथा व्यञ्जन का परिचयसमानाक्षर तथा सन्ध्यक्षरव्यञ्जन के चार भेद — स्पर्श, अन्तःस्थ, ऊष्म, अयोगवाहगुणिताक्षर तथा मात्रा-संयोजनवर्णों के छह उच्चारण-स्थान (पाणिनीय शिक्षा)
Characters & key ideas
सस्वराःजिन वर्णों का उच्चारण स्वतन्त्र रूप से होता है — अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ए, ऐ, ओ, औ।
ससन्ध्यक्षराणिदो स्वरों की सन्धि से बने स्वर — ए (अ+इ), ऐ (अ+ए), ओ (अ+उ), औ (अ+ओ)। इनके ह्रस्व रूप नहीं होते।
सस्पर्शाः (वर्ग्याः)क से म तक के पच्चीस व्यञ्जन, जो उच्चारण-स्थान के अनुसार पाँच वर्गों में विभक्त हैं।
अअयोगवाहौअनुस्वार (अं) तथा विसर्ग (अः) — दो विशिष्ट वर्ण; इनमें उच्चारणार्थ "अ" स्वर पहले जुड़ता है।
गगुणिताक्षराणिव्यञ्जन के साथ स्वरों के संयोग से बने मात्रा-युक्त अक्षर — जैसे क + आ = का, क + इ = कि।
उउच्चारणस्थानानिपाणिनीय शिक्षा के छह आधारभूत स्थान — कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ तथा नासिका।
Word meanings · शब्दार्थ
सन्धिद्वारा
सन्धि के द्वारा
नवीनाः
नए
सन्ध्यक्षर-स्वराः
सन्धि से बने स्वर
अनुनासिक-स्वराः
नाक से बोले जाने वाले स्वर
अपेक्षा
आवश्यकता
स्पर्शाः (वर्ग्याः)
वर्गों में रखे व्यञ्जन
अन्तःस्थाः
अर्धस्वर वाले वर्ण
ऊष्म-वर्णाः
गरम वायु से बोले वर्ण
अयोगवाहौ
विशेष दो व्यञ्जनवर्ण
गुणिताक्षराणि
स्वर-युक्त व्यञ्जनरूप
उच्चारण-स्थानानि
बोलने के स्थान
द्विस्थानीय-वर्णानाम्
दो स्थानों से बोले वर्ण
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वयम् अभ्यासं कुर्मः
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स्वराः
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जिन वर्णों का उच्चारण स्वतन्त्र रूप से होता है — अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ए, ऐ, ओ, औ।
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