वर्णमात्रा-परिचयः — Class 7 Sanskrit
दीपकम् · Chapter 13
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Chapter summary
Key ideas & terms
- मात्रा
- वर्ण के उच्चारण में लगने वाला समय; इसी से छन्द तथा श्लोक-रचना सधती है।
- ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत
- स्वर की तीन मात्राएँ — एकमात्र (अ), द्विमात्र (आ), त्रिमात्र (अ३)।
- अर्धमात्रा
- व्यञ्जन की मात्रा सदा अर्ध (½) होती है — "व्यञ्जनं चार्धमात्रिकम्"।
- प्लुतः
- त्रिमात्र स्वर; दूर से बुलाने ("हे३ राम!") तथा ओंकार में प्रयुक्त।
- अवग्रहः (ऽ)
- सन्धि में लुप्त "अ" को सूचित करने वाला चिह्न; इसका कोई उच्चारण नहीं — "कोऽपि"।
- मात्रा-गणना
- "राम = र्(½)+आ(२)+म्(½)+अ(१)+ः(½) = ४½ मात्राएँ" जैसी गणना।
Extra questions & answers
संस्कृत में वर्णों की कितनी प्रकार की मात्राएँ होती हैं?
संस्कृत में चार प्रकार की मात्राएँ होती हैं — ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत (स्वरों की तीन) तथा अर्धमात्रा (व्यञ्जन की)।
ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत में कितनी-कितनी मात्राएँ हैं?
ह्रस्व = एक मात्रा, दीर्घ = दो मात्रा, प्लुत = तीन मात्रा।
व्यञ्जन की कितनी मात्रा होती है?
सभी व्यञ्जनों की सदा अर्ध (½) मात्रा होती है।
संस्कृत में कुल कितने स्वर होते हैं?
प्लुत-भेद सहित संस्कृत में कुल बाईस (२२) स्वर होते हैं।
प्लुत-स्वर का प्रयोग कहाँ होता है?
प्लुत का प्रयोग दूर से बुलाने ("हे३ राम!") तथा वेद-मन्त्र के आरम्भ में ओंकार के उच्चारण में होता है।
मात्रा-विषयक प्रसिद्ध श्लोक क्या है?
"एकमात्रो भवेद् ह्रस्वः, द्विमात्रो दीर्घ उच्यते, त्रिमात्रश्च प्लुतो ज्ञेयः, व्यञ्जनं चार्धमात्रिकम्"।
कौन-सा पक्षी किस मात्रा-काल की ध्वनि करता है?
चाष एकमात्र, वायस द्विमात्र, शिखी (मयूर) त्रिमात्र तथा नकुल अर्धमात्र ध्वनि करता है।
"राम" शब्द में कितनी मात्राएँ हैं?
"राम" में ४½ मात्राएँ हैं — र्(½)+आ(२)+म्(½)+अ(१)+ः(½)।
मात्रा-गणना किसमें उपयोगी है?
मात्रा-गणना वर्ण-शब्द के सम्यक् उच्चारण तथा छन्दोबद्ध श्लोक-रचना में उपयोगी है।
अवग्रह (ऽ) चिह्न का क्या प्रयोजन है?
सन्धि में जब "अ" लुप्त होता है, तब उसे सूचित करने के लिए अवग्रह (ऽ) लगाया जाता है — जैसे "कोऽपि"; इसका कोई उच्चारण नहीं।


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