न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम् — Class 7 Sanskrit
दीपकम् · Chapter 4
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Chapter summary
यह पाठ ईसप की प्रसिद्ध "लोमड़ी और अंगूर" कथा का संस्कृत गीत-रूपान्तर है, जिसे अभिनय-सहित गाया जाता है। एक शृगाल (लोमड़ी) भूख तथा प्यास से व्याकुल होकर वन में जाता है, परन्तु उसे कुछ नहीं मिलता; वह थका-हारा तथा खिन्न होकर इधर-उधर देखता है। तभी उसे ऊपर एक द्राक्षालता (अंगूर की बेल) पर लटके अंगूर दिखते हैं और उन्हें देखकर उसके मुख में लार आ जाती है। वह एक बार, दो बार, तीन बार और बार-बार उछलता है, परन्तु अंगूर तक नहीं पहुँच पाता। अन्त में पसीने तथा श्रम से थककर वह यह कहता हुआ भाग जाता है कि "अंगूर खट्टे हैं" — अर्थात् जो वस्तु प्राप्य नहीं होती उसे लोग दोषपूर्ण कहकर अपना असफलता-दुःख छिपाते हैं। व्याकरण-दृष्टि से यह पाठ आत्मनेपदी धातुओं (जायते, लभते, पलायते, वन्दते, वर्धते, सेवते आदि) के लट्-लकार रूप सिखाता है — लभते, लभेते, लभन्ते इत्यादि।
शृगाल तथा द्राक्षाफल की कथा (गीत-रूप)असफलता को दोष बताने की मनोवृत्तिआत्मनेपदी धातु के लट्-लकार रूपपलायते/जायते/लभते जैसे क्रियापदअभिनय-सहित गायन
Key ideas & terms
- शृगालः
- लोमड़ी; कथा का मुख्य पात्र जो अंगूर खाना चाहता है पर पहुँच नहीं पाता।
- पिपासा-बुभुक्षा
- पिपासा = प्यास (पीने की इच्छा), बुभुक्षा = भूख (खाने की इच्छा)।
- द्राक्षालता
- अंगूर की बेल; इसी पर लटके अंगूर शृगाल को दिखते हैं।
- आत्मनेपदी धातु
- जिनके लट्-लकार रूप ते-थे-न्ते आदि में होते हैं — लभते, जायते, पलायते।
- पलायते
- भाग जाता है (आत्मनेपद); अन्त में शृगाल "आम्लं द्राक्षाफलम्" कहकर पलायते।
- आम्लम्
- खट्टा; अप्राप्य वस्तु को दोषपूर्ण बताकर असफलता छिपाने की मनोवृत्ति का प्रतीक।
Extra questions & answers
कौन वन में जाता है?
एक शृगाल (लोमड़ी) भूख तथा प्यास से व्याकुल होकर वन में जाता है।
शृगाल वन में किस अवस्था में पहुँचता है?
वन में उसे कुछ नहीं मिलता, इसलिए वह थका-हारा (श्रान्तः) तथा खिन्न हो जाता है।
शृगाल को द्राक्षालता पर क्या दिखता है?
उसे द्राक्षालता पर ऊपर लटके हुए अंगूर (द्राक्षाफल) दिखते हैं।
अंगूर देखकर उसके मुख में क्या होता है?
अंगूर देखकर उसी क्षण उसके मुख में लार (रस) आ जाती है।
शृगाल अंगूर पाने के लिए क्या करता है?
वह एक बार, दो बार, तीन बार और बार-बार उछलता है, पर पहुँच नहीं पाता।
अन्त में शृगाल क्या कहकर भाग जाता है?
अन्त में वह "आम्लं द्राक्षाफलम्" (अंगूर खट्टे हैं) कहकर भाग जाता है।
इस कथा का सन्देश क्या है?
जो वस्तु प्राप्य नहीं होती, उसे दोषपूर्ण बताकर लोग अपनी असफलता का दुःख छिपाते हैं।
आत्मनेपदी धातु के लट्-लकार में कौन-से अन्त होते हैं?
आत्मनेपदी धातु में ते, एते, न्ते आदि अन्त होते हैं — जैसे लभते, लभेते, लभन्ते।
"जायते" किस पद का रूप है?
"जायते" आत्मनेपदी जन्-धातु का लट्-लकार प्रथमपुरुष एकवचन रूप है।
योग्यताविस्तर में दी पिपीलिका वाली पंक्ति क्या सिखाती है?
चलती हुई चींटी सैकड़ों योजन तय कर लेती है, पर न चलने वाला गरुड़ भी एक पग नहीं चल पाता — निरन्तर प्रयत्न का महत्त्व।


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