भारति, जय, विजयकरे!
Class 9 Hindi · गंगा · Chapter 10
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The story in short
सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" की यह संस्कृतनिष्ठ, ओजपूर्ण कविता देशप्रेम से ओत-प्रोत है और भारतमाता की विजय की कामना करती है। कवि भारत को "कनक-शस्य-कमलधरे" कहकर उसकी कृषि-संपन्नता और श्रम-सौंदर्य की वंदना करता है। कविता में भारत को एक चेतन देवी-रूप में चित्रित किया गया है, जिसके चरणों को तीनों सागरों का जल धोता है और लंका जिसके चरण-तल में शतदल कमल के समान शोभित है। प्रकृति के विविध उपादानों को कवि भारत के वस्त्राभूषण के रूप में प्रस्तुत करता है — तरु, तृण, वन और लता उसके वस्त्र हैं; आँचल में फूल जड़े हैं; गंगा की धवल धारा गले का ज्योतिर्मय हार है; और हिमालय का श्वेत हिम-तुषार उसका मुकुट है। कवि भारत को ज्ञान-संपन्न सत्ता के रूप में देखता है, जिसके प्राणों में प्रणव "ओंकार" की ध्वनि है और जिसकी उदार दिशाओं में सैकड़ों स्वर मुखरित हो रहे हैं। रूपक, अनुप्रास, प्रकृति-मानवीकरण और सामासिक पदों के सुंदर प्रयोग से कविता भारत की भव्य, दिव्य और संपन्न छवि प्रस्तुत करती है।


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