मैं और मेरा देश
Class 9 Hindi · गंगा · Chapter 7
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- 16 texts summarised
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The story in short
कन्हैयालाल मिश्र "प्रभाकर" का यह निबंध व्यक्ति और राष्ट्र के अविभाज्य संबंध को गहराई से स्थापित करता है। लेखक पहले स्वयं को घर, पड़ोस और नगर में पूर्ण मानता था, पर लाला लाजपत राय के एक कथन ने उसके "मानस में भूकंप" ला दिया — "जहाँ भी मैं गया, भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक मेरे माथे पर लगा रहा।" इससे लेखक समझता है कि चाहे किसी के पास संसार के सब साधन हों, यदि उसका देश पराधीन या हीन है तो वे साधन उसे गौरव नहीं दे सकते। वह बताता है कि हर नागरिक अपने देश के लिए बहुत कुछ कर सकता है — जैसे युद्ध में जय बोलने वालों और दर्शकों की तालियों का भी महत्त्व होता है। स्वामी रामतीर्थ को फल देने वाले जापानी युवक और पुस्तक से चित्र चुराने वाले विदेशी विद्यार्थी की दो कहानियों, तथा कमालपाशा और नेहरू द्वारा साधारण भेंट के सम्मान के उदाहरणों से वह सिद्ध करता है कि कार्य की महानता उसके पीछे की भावना में है। अंत में वह देश के "शक्ति-बोध" और "सौंदर्य-बोध" की रक्षा तथा निष्पक्ष मतदान को नागरिक का कर्तव्य बताता है।


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