रीढ़ की हड्डी
Class 9 Hindi · गंगा · Chapter 6
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The story in short
जगदीशचंद्र माथुर की यह एकांकी (रचना-काल 1939) परंपरागत विवाह-व्यवस्था और स्त्री-शिक्षा को लेकर समाज की रूढ़िगत सोच पर तीखा व्यंग्य करती है। बाबू रामस्वरूप अपनी बेटी उमा का विवाह तय करने के लिए वकील गोपालप्रसाद और उनके बेटे शंकर को घर बुलाते हैं। लड़के वाले चाहते हैं कि लड़की कम पढ़ी-लिखी हो, इसीलिए रामस्वरूप झूठ कहते हैं कि उमा केवल मैट्रिक तक पढ़ी है। पूरी एकांकी में गोपालप्रसाद स्त्री-शिक्षा का विरोध और लड़की को "खूबसूरती के सामान" की तरह परखते दिखते हैं। जब चश्मा देखकर बात बिगड़ने लगती है, तब पढ़ी-लिखी, स्वाभिमानी उमा खुलकर बोल उठती है — वह पूछती है कि क्या लड़कियाँ कुर्सी-मेज की तरह बिकने वाली वस्तु हैं? वह यह भी उजागर करती है कि शंकर लड़कियों के होस्टल के पास भटकता पकड़ा गया था और भागा था। अंत में वह शंकर पर कटाक्ष करती है कि घर जाकर पता लगाइए कि आपके बेटे में "रीढ़ की हड्डी" यानी आत्मबल है भी या नहीं। एकांकी स्त्री के आत्मसम्मान, नैतिक साहस और शिक्षा के सच्चे अर्थ को सशक्त ढंग से प्रस्तुत करती है।


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