संगच्छध्वं संवदध्वम्
Class 8 Sanskrit · दीपकम् · Chapter 1
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The story in short
यह पाठ ऋग्वेद के अन्तिम (दशम) मण्डल के प्रसिद्ध "संज्ञान-सूक्त" अथवा "संघटन-सूक्त" के तीन मन्त्रों पर आधारित है। एक क्रीडोत्सव के प्रसंग से आरम्भ होकर पाठ यह सन्देश देता है कि विजय और सफलता का मूल आधार एकता, परस्पर सामञ्जस्य और मिलकर कार्य करना है। मन्त्रों में परमेश्वर के सन्देश-रूप में मनुष्यों को प्रेरित किया गया है कि वे साथ-साथ आगे बढ़ें (संगच्छध्वम्), एक स्वर से बोलें (संवदध्वम्) और परस्पर मनोभावों को समान रूप से जानें। जैसे सृष्टि के आरम्भ में अग्नि, वायु आदि देवशक्तियाँ अपना-अपना कर्तव्य परस्पर समन्वय के साथ निभाती हैं, वैसे ही मनुष्यों को भी परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व की प्रगति के लिए मिलकर कार्य करना चाहिए। सबका मन, संकल्प और हृदय समान हो, द्वेष-भाव न रहे — इसी से सुख, शान्ति, मैत्री और समृद्धि आती है। पाठ ऐक्यभाव, सहयोग और संगठन-शक्ति का महत्त्व बड़े सुन्दर ढंग से प्रस्तुत करता है।


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