यतीन्द्र मिश्र का यह व्यक्तिचित्र प्रसिद्ध शहनाई-वादक उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ के जीवन, संगीत-साधना और सरल व्यक्तित्व को प्रस्तुत करता है। काशी (बनारस) के बालाजी मंदिर और गंगा के घाटों से जुड़े बिस्मिल्ला ख़ाँ ने शहनाई को एक मांगलिक वाद्य से उठाकर शास्त्रीय संगीत की ऊँचाई तक पहुँचाया। पाठ उनकी गहरी धार्मिक सहिष्णुता को दर्शाता है — वे मुसलमान होते हुए भी काशी, गंगा और बालाजी के प्रति अपार श्रद्धा रखते थे और संगीत को सच्ची ‘इबादत’ मानते थे। वे सादगी से भरे, विनम्र और सदा अधिक अच्छा बजाने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने वाले कलाकार थे। यह पाठ कला की साधना, हिंदू-मुस्लिम एकता, काशी की सांस्कृतिक परंपरा और एक महान कलाकार की निश्छल मानवता को सुंदर ढंग से प्रस्तुत करता है।
बिस्मिल्ला ख़ाँ का जीवनशहनाई और संगीत-साधनाकाशी की सांस्कृतिक परंपराधार्मिक सहिष्णुताकला और इबादत
Characters & key ideas
बबिस्मिल्ला ख़ाँविश्वप्रसिद्ध शहनाई-वादक जिनका जीवन इस पाठ में चित्रित है।
शशहनाईवह मांगलिक वाद्य जिसे बिस्मिल्ला ख़ाँ ने शास्त्रीय ऊँचाई तक पहुँचाया।
ककाशीबनारस — बिस्मिल्ला ख़ाँ की संगीत-साधना और श्रद्धा का केंद्र।
इइबादतउपासना; बिस्मिल्ला ख़ाँ संगीत को सच्ची इबादत मानते थे।
धधार्मिक सहिष्णुताविभिन्न धर्मों के प्रति आदर — पाठ का प्रमुख भाव।
ननौबतखानामंदिर/महल का वह स्थान जहाँ मांगलिक अवसरों पर वाद्य बजते हैं।
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नौबतखाने में इबादत
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