मंगलेश डबराल की कविता ‘संगतकार’ उस सहयोगी कलाकार को समर्पित है जो मुख्य गायक के साथ गाता है पर कभी प्रमुखता नहीं पाता। संगतकार मुख्य गायक की आवाज़ को सहारा देता है, उसके स्वर के पीछे अपना स्वर मिलाता है और जब मुख्य गायक थककर लय खोने लगता है, तब संगतकार ही उसे सँभालता है। फिर भी वह जान-बूझकर अपनी आवाज़ को मुख्य गायक से ऊँचा नहीं उठने देता, ताकि मुख्य गायक की महिमा बनी रहे। कवि कहते हैं कि संगतकार की यह विनम्रता उसकी कमज़ोरी नहीं, बल्कि उसकी मनुष्यता और महानता है। यह कविता समाज के उन सब अनाम, पर्दे के पीछे काम करने वाले सहयोगियों के प्रति सम्मान व्यक्त करती है जिनके बिना किसी की सफलता संभव नहीं।
संगतकार की भूमिकासहयोग का महत्त्वविनम्रता बनाम कमज़ोरीअनाम कलाकारों का सम्मानमनुष्यता का भाव
Characters & key ideas
ससंगतकारमुख्य गायक के साथ सहायक स्वर देने वाला कलाकार।
ममुख्य गायकवह प्रमुख कलाकार जिसे संगतकार सहारा देता है।
वविनम्रतासंगतकार का अपने स्वर को ऊँचा न उठने देना — उसकी मनुष्यता।
ससहयोगपर्दे के पीछे रहकर दूसरे की सफलता में योगदान।
अअनाम कलाकारवे सहयोगी जिन्हें प्रसिद्धि नहीं मिलती।
ममनुष्यतासंगतकार की विनम्रता में निहित बड़प्पन।
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‘संगतकार’ कविता के रचयिता कौन हैं?
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संगतकार
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