पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि — Class 6 Sanskrit
दीपकम् · Chapter 13
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Chapter summary
यह पाठ विविध ग्रन्थों से संकलित सुभाषितों (सुन्दर सुवचनों) का संग्रह है, जो उत्तम कार्यों के लिए प्रेरणा देते हैं। संवाद-शैली में आरम्भ होकर पाठ अनेक सुभाषित-श्लोक प्रस्तुत करता है, प्रत्येक के साथ पदच्छेद, अन्वय तथा भावार्थ दिया गया है। प्रमुख सन्देश हैं — पृथ्वी पर तीन रत्न हैं: जल, अन्न तथा सुभाषित (मूर्ख लोग पत्थरों को रत्न कहते हैं); उदारचरित लोगों के लिए सम्पूर्ण पृथ्वी ही परिवार है ("वसुधैव कुटुम्बकम्"); कार्य उद्यम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा से नहीं (सोते हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते); अभिवादनशील तथा वृद्धों की सेवा करने वाले के आयु, विद्या, यश तथा बल — चारों बढ़ते हैं; जहाँ उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति तथा पराक्रम हों वहाँ ईश्वर सहायक होता है; विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म तथा धर्म से सुख प्राप्त होता है; जननी तथा जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं। योग्यता-विस्तार इन सुभाषितों के स्रोत-ग्रन्थों (चाणक्यनीति, मनुस्मृति, पञ्चतन्त्र, हितोपदेश, रामायण) का परिचय देता है।
The story in steps
- पाठ संवाद से शुरू होता है और पूछता है कि पृथ्वी पर सच्चे रत्न कौन हैं।
- पहला सुभाषित बताता है कि जल, अन्न और सुभाषित ही असली रत्न हैं।
- अगले श्लोक उदारता, परिश्रम, साहस और पुरुषार्थ का महत्व बताते हैं।
- फिर पाठ बड़ों के सम्मान, सेवा और विद्या से मिलने वाले गुणों को समझाता है।
- अंत के श्लोक जन्मभूमि, धर्म और लोकमंगल की ऊँची भावना जगाते हैं।
पृथ्वी के तीन रत्नवसुधैव कुटुम्बकम्उद्यम तथा अभिवादनशीलता का महत्त्वविद्या-विनय-धर्म-सुख की परम्परासुभाषित-स्रोत ग्रन्थ
Key ideas & terms
- त्रीणि रत्नानि
- पृथ्वी के तीन रत्न — जल, अन्न तथा सुभाषित।
- वसुधैव कुटुम्बकम्
- सम्पूर्ण पृथ्वी ही (उदार लोगों का) परिवार है — विश्वबन्धुत्व का सन्देश।
- उद्यमः
- परिश्रम; "उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः" — परिश्रम से ही कार्य सिद्ध होते हैं।
- अभिवादनशीलः
- जो बड़ों का सम्मान/अभिवादन करता है; ऐसे व्यक्ति के आयु-विद्या-यश-बल बढ़ते हैं।
- गरीयसी
- श्रेष्ठ/महान्; "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी"।
- सुभाषितम्
- सुन्दर सुवचन; विविध ग्रन्थों से संकलित नीति-वचन।
शब्दार्थ · Word meanings
- पृथिव्याम्
- पृथ्वी पर
- त्रीणि
- तीन
- रत्नानि
- बहुमूल्य वस्तुएँ
- सुभाषितम्
- सुन्दर और हितकारी वचन
- मूढाः
- मूर्ख लोग
- उदारचरितानाम्
- उत्तम आचरण वालों के
- वसुधैव कुटुम्बकम्
- सारी पृथ्वी ही परिवार है
- उद्यमेन
- परिश्रम से
- अभिवादनशीलस्य
- नमस्कार करने की आदत वाले
- विनयः
- नम्रता
- पात्रताम्
- योग्यता
- जन्मभूमिः
- जन्म की भूमि, मातृभूमि
Extra questions & answers
पृथ्वी के तीन रत्न कौन-से हैं?
पृथ्वी के तीन रत्न हैं — जल, अन्न तथा सुभाषित।
"वसुधैव कुटुम्बकम्" किनके लिए कहा गया है?
यह उदारचरित (उदार स्वभाव वाले) लोगों के लिए कहा गया है, जिनके लिए सम्पूर्ण पृथ्वी ही परिवार है।
कार्य किससे सिद्ध होते हैं?
कार्य उद्यम (परिश्रम) से सिद्ध होते हैं, केवल मनोरथ (इच्छा) से नहीं।
अभिवादनशील तथा वृद्ध-सेवक के क्या बढ़ते हैं?
उसके आयु, विद्या, यश तथा बल — ये चार बढ़ते हैं।
विद्या से क्रमशः क्या-क्या प्राप्त होता है?
विद्या से विनय, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म तथा धर्म से सुख प्राप्त होता है।
जननी तथा जन्मभूमि की तुलना किससे की गई है?
जननी तथा जन्मभूमि को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ (गरीयसी) कहा गया है।
जहाँ छह गुण (उद्यम, साहस आदि) हों वहाँ कौन सहायक होता है?
जहाँ उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति तथा पराक्रम हों वहाँ ईश्वर (देव) सहायक होता है।
पुस्तक में बन्द विद्या तथा दूसरे के हाथ में गया धन किस समय उपयोगी नहीं होते?
कार्य के समय (आवश्यकता के समय) पुस्तकस्थ विद्या तथा परहस्तगत धन उपयोगी नहीं होते।
चाणक्यनीति के रचनाकार कौन हैं?
चाणक्यनीति के रचनाकार चाणक्य हैं।
पञ्चतन्त्र के पाँच तन्त्र कौन-से हैं?
मित्रभेद, मित्रलाभ, काकोलूकीयम्, लब्धप्रणाश तथा अपरीक्षितकारक।


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