घर की याद
Class 9 Hindi · गंगा · Chapter 12
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The story in short
भवानीप्रसाद मिश्र की यह कविता 1942 के "भारत छोड़ो आंदोलन" के समय जेल में रहते हुए लिखी गई थी; इसकी केंद्रीय संवेदना परिवार की स्मृति है। लगातार बरसते सावन के पानी के बीच कवि को अपना घर और एक-एक परिजन याद आता है — चार भाई, चार बहनें, बिन-पढ़ी पर स्नेहमयी माँ, और "वज्र-भुजा नवनीत-सा उर" वाले भोले-बहादुर पिता, जिन पर बुढ़ापा भी असर नहीं करता। कवि कल्पना करता है कि उसके न रहने पर पिता पाँचवें बेटे (स्वयं कवि) का नाम लेकर रो पड़े होंगे और माँ ने धैर्य बँधाते हुए कहा होगा कि भवानी का जेल जाना ठीक ही है, यह उसकी लीक है। पिता अत्यंत संवेदनशील हैं — बड़ के पेड़-से, जिसका एक पत्ता टूटने पर भी दूध की धारा फूट पड़े। कवि सावन के बादल को संदेशवाहक बनाकर आग्रह करता है कि वह परिवार को धीरज दे और कहे कि वह मज़े में है, काम कर रहा है, मस्त है — पर यह न बताए कि वह जेल के कष्ट सह रहा है, ताकि उसके पिता पाँचवें बेटे के लिए न तरसें। कविता में देशभक्ति के त्याग और पारिवारिक प्रेम की कोमल संवेदना का मार्मिक मेल है।


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