यह पाठ भारतीय संस्कृति में अतिथि-सेवा के महत्त्व को एक हृदयस्पर्शी कथा द्वारा प्रस्तुत करता है। "अतिथिदेवो भव" (अतिथि देव के समान है) यह उपनिषद्-वचन है और अतिथि-सेवा पञ्चमहायज्ञों में से एक है। हमारे देश में केवल मनुष्य ही नहीं, अन्य प्राणी भी अतिथि-रूप में प्रीतिपात्र होते हैं। कथा में राधिका नामक बालिका के घर एक मार्जारी (बिल्ली) तथा उसके चार शावक (तन्वी, मृद्वी, शबल, भीम) अतिथि-रूप में आते हैं। राधिका इन्हें विशिष्ट अतिथि मानकर मार्जारी को दूध देती है तथा शावकों की देखभाल करती है। पितामही राधिका को "अतिथिदेवो भव" का अर्थ समझाती हैं — अतिथि को देव मानकर आदरपूर्वक सेवा करनी चाहिए। राधिका शावकों को भी प्रेमपूर्वक यही पाठ सिखाती है। पाठ का व्याकरण-बिन्दु अव्यय-पद है — अत्र, तत्र, अन्यत्र, सर्वत्र, उपरि, अधः, बहिः, अन्तः आदि अव्यय जो लिङ्ग-वचन-विभक्ति में नहीं बदलते। "कुत्र अस्ति? कुत्र नास्ति?" शैली में अव्यय-अभ्यास कराया गया है।
The story in 6 beats
1भारतीय संस्कृति में अतिथि का बहुत महत्त्व है और अतिथिसेवा को देवसेवा जैसा माना जाता है।
2राधिका इन दिनों बहुत उत्साह से चलती है, क्योंकि उसके घर की छत पर नए अतिथि आए हैं।
3वे अतिथि एक मार्जारी और उसके चार शावक हैं, जिनके नाम राधिका तन्वी, मृद्वी, शबल और भीम रखती है।
4राधिका मार्जारी को क्षीर देती है, शावकों के पास जाती है, और मार्जारी धीरे-धीरे उसके पीछे आती है।
5पितामही राधिका की गतिविधियाँ देखकर हँसती है और अतिथि आने पर ऐसी सेवा करनी चाहिए, यह समझाती है।
6राधिका दिन भर 'अतिथिदेवो भव' कहती है और शावकों को भी प्रेम से यही वचन बोलने को कहती है।
अतिथि-सेवा का महत्त्व"अतिथिदेवो भव" का भावराधिका तथा मार्जारी-शावकों की कथाअव्यय-पद का परिचयस्थान/दिशावाची अव्यय अभ्यास
Characters & key ideas
अअतिथिदेवो भवउपनिषद्-वचन — "अतिथि को देव मानो"; अतिथि-सेवा का मूल भाव।
पपञ्चमहायज्ञाःपाँच नित्य-कर्तव्य; इनमें अतिथि-सेवा (नृयज्ञ) सम्मिलित है।
ममार्जारीबिल्ली; कथा में अतिथि-रूप में आने वाली प्राणी।
अअव्ययम्जो पद लिङ्ग, वचन तथा विभक्ति में नहीं बदलता — जैसे अत्र, तत्र, सर्वत्र।