बिरजू महाराज से साक्षात्कार — Class 7 Hindi
मल्हार · Chapter 8
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Chapter summary
The story in steps
- बिरजू महाराज अपने संघर्षपूर्ण बचपन, गरीबी और माँ के सहारे बने रहने की बात बताते हैं।
- वे कहते हैं कि उन्होंने कथक पिता और चाचाओं को देखकर सीखा और बाद में औपचारिक तालीम पाई।
- वे कथक की पुरानी परंपरा, घरानों, लय और संगीत की जरूरत को सरल उदाहरणों से समझाते हैं।
- वे बताते हैं कि कथक की प्रस्तुति में समय के साथ बदलाव आए हैं, पर परंपरा बनी रहती है।
- वे शास्त्रीय और लोक नृत्य का अंतर, अलग नृत्य-शैलियों की विशेषताएँ और कथक की भंगिमाएँ बताते हैं।
- अंत में वे बच्चों, अभिभावकों और लड़कियों की शिक्षा, हुनर, संगीत और अनुशासन पर अपने विचार रखते हैं।
Key ideas & terms
- कथक
- उत्तर भारत की प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैली, जिसका नाम कथा कहने वाले "किथक" से पड़ा; इसमें घरानों का विकास इसकी विशेषता है।
- गंडा बाँधना
- गुरु-शिष्य के बीच का पवित्र रिश्ता आरंभ करने की रस्म, जिसमें गुरु शिष्य को ताबीज़ बाँधता है।
- घराना
- संगीत-नृत्य की वह विशिष्ट शैली व परंपरा जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रशिक्षण द्वारा आगे बढ़ती है, जैसे लखनऊ-जयपुर-बनारस घराना।
- लय
- संगीत और जीवन में संतुलन बनाए रखने वाला आवरण, जो नृत्य को सुंदरता प्रदान करता है।
- शास्त्रीय नृत्य
- नियमबद्ध, दर्शकों के लिए किया जाने वाला एकल नृत्य; लोक नृत्य से भिन्न, जो सामूहिक और मनोरंजन के लिए होता है।
- बिरजू महाराज
- पद्मविभूषण कथक नर्तक, जो अपनी मनमोहक प्रस्तुतियों के लिए भारत और विदेशों में प्रसिद्ध थे।
शब्दार्थ · Word meanings
- देहांत
- मृत्यु
- आर्थिक परेशानियाँ
- पैसे की कठिनाइयाँ
- जरी
- सोने-चाँदी के महीन तार
- गजारा
- जीवन-यापन
- तालीम
- शिक्षा या प्रशिक्षण
- गंडा
- गुरु-शिष्य का ताबीज
- लगन
- मन लगाकर करने की चाह
- कथावाचक
- कथा सुनाने वाला
- भंगिमाएँ
- हाव-भाव और मुद्राएँ
- प्रस्तुतीकरण
- पेश करने का ढंग
- जगलबंदी
- दो कलाकारों का संगत खेल
- आत्मनिर्भर
- अपने बल पर रहने वाला
Extra questions & answers
बिरजू महाराज का बचपन कैसा था?
पहले उनका परिवार "छोटे नवाब" कहलाता था और संपन्न था, पर पिता के देहांत के बाद घोर आर्थिक कठिनाइयाँ आईं और संघर्ष का दौर शुरू हुआ।
संघर्ष के दिनों में उनकी सबसे बड़ी सहयोगी कौन थीं?
उनकी माँ (अम्मा), जो कठिनाई में भी कहती थीं — "खाने को कुछ मिले या न मिले, पर अभ्यास ज़रूर करो।"
बिरजू महाराज ने कथक किससे सीखा?
अपने पिता अच्छन महाराज तथा चाचा शंभू महाराज और लच्छू महाराज से; घर में कथक का माहौल होने से वे औपचारिक प्रशिक्षण से पहले ही सीख गए थे।
बिरजू महाराज ने "गंडा बाँधने" की परंपरा में क्या परिवर्तन किया?
अब वे शुरू में ही नहीं, बल्कि कई वर्ष नृत्य सिखाने के बाद, जब शिष्य में सच्ची लगन देखते हैं, तभी गंडा बाँधते हैं — अर्थात वे शिष्य के समर्पण को परखते हैं।
लय का जीवन में क्या महत्त्व बताया गया है?
कि लय केवल नृत्य में नहीं, जीवन के हर काम में संतुलन बनाए रखती है; घास काटने से लेकर हर गतिविधि में लय होती है और ज़रा-सी गड़बड़ी हानि पहुँचा सकती है।
लोक नृत्य और शास्त्रीय नृत्य में क्या अंतर है?
लोक नृत्य सामूहिक होता है और थकान दूर करने व मनोरंजन के लिए किया जाता है, जबकि शास्त्रीय नृत्य नियमबद्ध, एकल और दर्शकों के लिए होता है।
बिरजू महाराज की बहुमुखी प्रतिभा किन-किन बातों से प्रकट होती है?
वे नृत्य के साथ-साथ गाते-बजाते थे, नृत्य-नाटिकाएँ रचते थे, मशीनें ठीक करते थे और चित्रकारी भी करते थे।
उन्होंने बच्चों की शिक्षा और रुचियों के बारे में अभिभावकों से क्या कहा?
कि यदि बच्चे की रुचि संगीत-नृत्य में हो तो उसे लय के साथ खेलने देना चाहिए, क्योंकि इससे संतुलन, समय का अंदाज़ा और बौद्धिक विकास होता है।
बिरजू महाराज मिहलाओं की शिक्षा के बारे में क्या सोचते थे?
वे समानता के पक्षधर थे; उन्होंने अपनी बेटियों को कथक सिखाया और कहा कि लड़कियों के पास शिक्षा या हुनर अवश्य होना चाहिए ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।
"साक्षात्कार" विधा की क्या विशेषता है?
इसका एक निश्चित उद्देश्य और ढाँचा होता है; इसमें साक्षात्कारदाता के जीवन, कार्य, उपलब्धियों और विचारों को प्रश्नों के माध्यम से पाठकों के सामने लाया जाता है।
मेरी समझ से
(क) नीचे दिए गए प्रश्नों का सबसे सही उत्तर कौन-सा है? उनके सामने तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं। (1) बिरजू महाराज ने गंडा बाँधने की परंपरा में परिवर्तन क्यों किया होगा? • वे गुरु के प्रति शिष्य के निष्ठा भाव को परखना चाहते थे। • वे नृत्य शिक्षण के लिए इस परंपरा को महत्वपूर्ण नहीं मानते थे। • वे नृत्य के प्रति शिष्य के लगन व समर्पण भाव को जाँचना चाहते थे। • वे शिष्य की भेंट देने की सामर्थ्य को परखना चाहते थे।
सही उत्तर है — वे नृत्य के प्रति शिष्य के लगन व समर्पण भाव को जाँचना चाहते थे। बिरजू महाराज ने परंपरा को उल्टा कर दिया और कई वर्षों तक सिखाने के बाद जब उन्हें लगता था कि शिष्य में सच्ची लगन है तभी गंडा बाँधते थे, ताकि यह पवित्र रिश्ता योग्य शिष्य के साथ ही जुड़े। पहला विकल्प भी आंशिक रूप से सही माना जा सकता है क्योंकि लगन में निष्ठा भी शामिल है, पर मुख्य कारण लगन और समर्पण की परख है।
(क) नीचे दिए गए प्रश्नों का सबसे सही उत्तर कौन-सा है? उनके सामने तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं। (2) “जीवन में उतार-चढ़ाव तो होता ही है।” बिरजू महाराज के जीवन में किस तरह के उतार-चढ़ाव आए? • पिता के देहांत के बाद आर्थिक अभावों का सामना करना पड़ा। • कोई भी संस्था नृत्य प्रस्तुतियों के लिए आमंत्रित नहीं करती थी। • किसी समय विशेष में घर में सुख-समृद्धि थी। • नृत्य के औपचारिक प्रशिक्षण के अवसर बहुत ही सीमित हो गए थे।
सही उत्तर हैं — पिता के देहांत के बाद आर्थिक अभावों का सामना करना पड़ा और किसी समय विशेष में घर में सुख-समृद्धि थी। महाराज बताते हैं कि कभी उनकी हवेली पर आठ-आठ सिपाहियों का पहरा था और डिब्बों में लाखों के हार थे, पर पिता के जाने के बाद डिब्बे खाली हो गए, कर्ज लेना पड़ा और कई बार रात को भोजन भी नहीं मिलता था। यही उतार-चढ़ाव है।
(क) नीचे दिए गए प्रश्नों का सबसे सही उत्तर कौन-सा है? उनके सामने तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं। (3) बिरजू महाराज के अनुसार बच्चों को लय के साथ खेलने की अनुशंसा क्यों की जानी चाहिए? • संगीत, नृत्य, नाटक और सभी कलाएँ बच्चों में मानवीय मूल्यों का विकास नहीं करती हैं। • कला संबंधी विषयों से जुड़ाव बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। • कला भी एक खेल है, जिसमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। • वर्तमान समय में कला भी एक सफल माध्यम नहीं है।
सही उत्तर हैं — कला संबंधी विषयों से जुड़ाव बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और कला भी एक खेल है, जिसमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। बिरजू महाराज कहते हैं कि लय के साथ खेलने से बच्चों में संतुलन, समय का अंदाज़ा और सदुपयोग की समझ आती है जो बौद्धिक विकास के लिए जरूरी है।
(ख) अब अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए और कारण बताइए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
हमने ये उत्तर इसलिए चुने क्योंकि वे सीधे पाठ के प्रसंगों पर आधारित हैं। गंडा बाँधने के बारे में महाराज स्वयं कहते हैं कि वे शिष्य की सच्ची लगन देखकर ही गंडा बाँधते हैं, भेंट की सामर्थ्य देखकर नहीं। उतार-चढ़ाव वाले प्रश्न में पाठ में आर्थिक तंगी और पहले की समृद्धि दोनों का स्पष्ट उल्लेख है। लय के साथ खेलने वाले प्रश्न में महाराज ने कला को खेल बताते हुए उसके शैक्षिक लाभ बताए हैं, इसलिए वही विकल्प सही हैं। मित्रों से चर्चा करने पर यह भी समझ आता है कि कला मानवीय मूल्यों को बढ़ाती है, घटाती नहीं, इसलिए पहला और चौथा विकल्प गलत हैं।
मिलकर करें मिलान
कर्नाटक संगीत शैली
भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक शैली, जो मुख्य रूप से दक्षिण भारत के राज्यों में प्रचलित है। इसमें स्वर शैली की प्रधानता होती है। जल तरंग, वीणा, मृदंग, मंडोलिन वाद्ययंत्रों से संगत दी जाती है।
घराना
हिंदुस्तानी संगीत में कलाकारों का एक समुदाय या कुटुंब, जो संगीत नृत्य की विशिष्ट शैली साझा करते हैं। संगीत या नृत्य की परंपरा, जिसमें सिद्धांत और शैली पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रशिक्षण के द्वारा आगे बढ़ती है।
शास्त्रीय संगीत
भारत की प्राचीन गायन-वादन गीत-नृत्य अभिनय परंपरा का अभिन्न अंग है। इसमें शब्दों की अपेक्षा सुरों का महत्व होता है। इसमें नियमों की प्रधानता होती है।
हिंदुस्तानी संगीत शैली
भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक शैली, जो मुख्य रूप से उत्तर भारत के राज्यों में प्रचलित है। तबला, सारंगी, सितार, संतूर वाद्ययंत्रों से संगत दी जाती है। इसके प्रमुख रागों की संख्या छह है।
कनछेदन
हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में एक है, यह कान में सोने या चाँदी का तार पहनाने से संबंधित है।
लोक नृत्य
किसी क्षेत्र विशेष में लोक द्वारा किए जाने वाले पारंपरिक नृत्य। लोक नृत्य, क्षेत्र विशेष की संस्कृति एवं रीति-रिवाजों को दर्शाते हैं। ये विशेष रूप से फसल कटाई, उत्सवों आदि के अवसर पर किए जाते हैं।
शीर्षक
इस पाठ का शीर्षक ‘बिरजू महाराज से साक्षात्कार’ है। यदि आप इस साक्षात्कार को कोई अन्य नाम देना चाहते हैं तो क्या नाम देंगे? आपने यह नाम क्यों सोचा? लिखिए।
मैं इस साक्षात्कार को ‘लय, साधना और जीवन — बिरजू महाराज की जुबानी’ नाम देना चाहूँगा। यह नाम इसलिए सोचा क्योंकि पूरे साक्षात्कार में महाराज अपने बचपन के संघर्ष, लय के महत्व, कथक की परंपरा और जीवन-दर्शन के बारे में बताते हैं। यह शीर्षक उनके कला-जीवन और विचारों दोनों को दर्शाता है। दूसरा विकल्प ‘नृत्य के जादूगर बिरजू महाराज’ भी हो सकता है क्योंकि वे कथक को जादू की तरह मनमोहक बनाते थे।
पंक्तियों पर चर्चा
“तुम नौकरी में बँट जाओगे। तुम्हारे अंदर का नर्तक पूरी तरह पनप नहीं पाएगा।” — इसका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार लिखिए।
इसका अर्थ है कि नौकरी में समय और ध्यान बँट जाता है और कला के लिए पूरी एकाग्रता नहीं मिल पाती। बिरजू महाराज के चाचा ने चेतावनी दी थी कि यदि कला को बाँटोगे तो नर्तक का पूरा विकास नहीं होगा। महाराज ने इसे चुनौती मानकर दृढ़ निश्चय से रियाज़ जारी रखा और सिद्ध किया कि लगन हो तो दोनों संभाले जा सकते हैं।
“नृत्य में शरीर, ध्यान और तपस्या का साधन होता है।” — इसका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार लिखिए।
इसका अर्थ है कि नृत्य केवल हाथ-पैर हिलाना नहीं है, बल्कि शरीर को साधना, मन को एकाग्र करना और लगातार अभ्यास रूपी तपस्या करनी पड़ती है। जैसे तपस्वी ध्यान लगाता है वैसे ही नर्तक अपने अंगों, लय और भाव पर ध्यान देता है और अदृश्य शक्ति को अपने भीतर बुलाता है।
“कथक में गर्दन को हल्के से हिलाया जाता है, चिराग की लौ के समान।” — इसका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार लिखिए।
इसका अर्थ है कि कथक में गर्दन और उँगलियों की गति बहुत कोमल और नाजुक होती है, जैसे हवा में दीये की लौ धीरे-धीरे हिलती है। यदि हलचल तेज हो तो सौंदर्य बिगड़ जाता है। इसीलिए गुरु टोकते थे कि घूँघट धीरे से उठाओ, जोर से नहीं। यह कोमलता ही कथक की सुंदरता है।
सोच-विचार के लिए
1. साक्षात्कार को एक बार पुनः पढ़िए और निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए। (क) बिरजू महाराज नृत्य का औपचारिक प्रशिक्षण आरंभ होने से पहले ही कथक कैसे सीख गए थे?
उनके घर में कथक का माहौल था। पिता अच्छन महाराज और चाचा शंभू व लच्छू महाराज बड़े कथक नर्तक थे। बचपन से देख-देखकर वे नकल करते थे और नवाब के दरबार में नाचने भी लगे थे, इसलिए औपचारिक गंडा बँधने से पहले ही उन्हें कथक आ गया था।
1. साक्षात्कार को एक बार पुनः पढ़िए और निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए। (ख) नृत्य सीखने के लिए संगीत की समझ होना क्यों अनिवार्य है?
क्योंकि गाना, बजाना और नाचना तीनों संगीत के हिस्से हैं और संगीत की आत्मा लय है। यदि नर्तक को सुर-ताल और लहरा की समझ नहीं होगी तो वह समय पर सही भाव और गति नहीं ला पाएगा। लय ही नृत्य में संतुलन और सुंदरता लाती है, इसलिए संगीत की समझ जरूरी है।
1. साक्षात्कार को एक बार पुनः पढ़िए और निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए। (ग) नृत्य के अतिरिक्त बिरजू महाराज को और किन-किन कार्य में रुचि थी?
उन्हें तबला और हारमोनियम बजाने, गाने, नृत्य-नाटिकाएँ बनाने और उनके लिए संगीत तैयार करने, मशीनें खोलने-जोड़ने, पंखा-फ्रिज ठीक करने, पेंचकस-औजार रखने और चित्रकारी करने में रुचि थी। वे कहते थे कि यदि नर्तक न होते तो शायद इंजीनियर होते।
1. साक्षात्कार को एक बार पुनः पढ़िए और निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए। (घ) बिरजू महाराज ने बच्चों की शिक्षा और रुचियों के बारे में अभिभावकों से क्या कहा है?
उन्होंने विनती की कि यदि बच्चे की रुचि गाना-बजाना-नाचना में है तो उसे लय के साथ खेलने दें। यह भी एक खेल है जो संतुलन, अनुशासन और समय के सदुपयोग से बौद्धिक विकास करता है। लड़कियों के पास शिक्षा या कोई हुनर जरूर होना चाहिए ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें, क्योंकि हुनर कोई नहीं छीन सकता।
2. पाठ में से उन प्रसंगों की पहचानकर उन पर चर्चा कीजिए, जिनसे पता चलता है कि— (क) बिरजू महाराज बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे।
वे केवल नर्तक नहीं थे — वे गाते थे, तबला-हारमोनियम बजाते थे, नृत्य-नाटिकाएँ लिखते और संगीतबद्ध करते थे, चित्र बनाते थे और मशीनें ठीक करते थे। पाँच साल की उम्र में हारमोनियम पर लहरा बजाना, फिल्मी गाने गाना, सौ से अधिक चित्र बनाना और ब्रह्मा-विष्णु-महेश जैसे तीन गुरुओं की शिक्षा को मिलाकर नया रूप बनाना उनकी बहुमुखी प्रतिभा दिखाता है।
2. पाठ में से उन प्रसंगों की पहचानकर उन पर चर्चा कीजिए, जिनसे पता चलता है कि— (ख) बिरजू महाराज को नृत्य की ऊँचाइयों तक पहुँचाने में उनकी माँ का बहुत योगदान रहा।
पिता के देहांत के बाद आर्थिक तंगी में माँ ने कर्ज लेकर और पुरानी ज़री की साड़ियाँ जलाकर उनके तार बेचकर घर चलाया, पर रियाज़ नहीं रुकने दिया। वे बार-बार कहती थीं — खाने को चना मिले या कुछ न मिले पर अभ्यास जरूर करो। उन्हीं की प्रेरणा और दो कार्यक्रमों की कमाई को गंडा की भेंट बनाकर उन्होंने महाराज का प्रशिक्षण शुरू करवाया।
2. पाठ में से उन प्रसंगों की पहचानकर उन पर चर्चा कीजिए, जिनसे पता चलता है कि— (ग) बिरजू महाराज महिलाओं के लिए समानता के पक्षधर थे।
उन्होंने बताया कि उनकी बहनों को कथक नहीं सिखाया गया, पर उन्होंने अपनी बेटियों को खूब सिखाया। उनका मानना था कि लड़कियों के पास शिक्षा या कोई हुनर अवश्य होना चाहिए ताकि वे आत्मनिर्भर हो सकें। यह सोच उनकी समानता और प्रगतिशील दृष्टि को दिखाती है।
शब्दों की बात
(ख) नीचे दो तबले हैं, एक में कुछ शब्दांश (उपसर्ग व प्रत्यय) हैं, दूसरे तबले में मूल शब्द हैं। इनकी सहायता से नए शब्द बनाइए—
उपसर्ग और प्रत्यय जोड़कर नए शब्द इस प्रकार बनते हैं: आ + जीवी = आजीविका नहीं, आ + गमन = आगमन; सु + मर्म = सुमर्म नहीं, सु + संस्कृत = सुसंस्कृत; अ + दृश्य = अदृश्य; राष्ट्र + ईय = राष्ट्रीय; समूह + इक = सामूहिक; भारत + ईय = भारतीय; कला + इत = कलित नहीं, सीमा + इत = सीमित; सुंदर + ता = सुंदरता; श्रम + इक = श्रमिक। उदाहरण के लिए — आ + हार = आहार, अनु + शासन = अनुशासन, प्रति + भा = प्रतिभा।
(ग) इस पाठ में से उपसर्ग व प्रत्यय की सहायता से बने कुछ और शब्द छाँटकर उनसे वाक्य बनाइए।
पाठ से चुने शब्द और वाक्य: 1. प्रशिक्षण (प्र + शिक्षण) — बिरजू महाराज ने कठिन प्रशिक्षण से कथक में महारत पाई। 2. असाधारण नहीं, असमर्थ नहीं, पर ‘आविष्कार’ — आवरण (आ + वरण) — लय नृत्य को आवरण जैसी सुंदरता देती है। 3. भारतीय (भारत + ईय) — कथक एक भारतीय शास्त्रीय नृत्य है। 4. सामूहिक (समूह + इक) — लोक नृत्य सामूहिक खुशी के लिए किया जाता है।
शब्दों का प्रभाव
“कुछ कथिक डर गए किंतु उन कथिकों की कला में इतना दम था कि डाकू सब कुछ भूलकर उन कथिकों के कथक में मग्न हो गए।” इस वाक्य में रेखांकित शब्द ‘इतना’ हटाकर वाक्य पढ़िए और पहचानिए कि क्या परिवर्तन आया है? पाठ में आए हुए वाक्यों में से ऐसे ही कुछ और शब्द ढूँढ़कर उन्हें रेखांकित कीजिए जिनके प्रयोग से वाक्य में विशेष प्रभाव उत्पन्न होता है?
यदि ‘इतना’ हटा दें तो वाक्य — ‘उन कथिकों की कला में दम था कि डाकू मग्न हो गए’ — कम प्रभावशाली लगता है। ‘इतना’ शब्द कला की तीव्रता और डाकुओं पर उसके गहरे असर को बढ़ा देता है। इसी तरह पाठ में ‘बहुत’, ‘खूब’, ‘पूरी तरह’, ‘हल्के से’, ‘बिलकुल’, ‘भी’ जैसे शब्द विशेष प्रभाव लाते हैं, जैसे — ‘बहुत छुटपन से तबला पीटना शुरू कर दिया’, ‘खूब गाता था’, ‘पूरी तरह पनप नहीं पाएगा’, ‘गर्दन को हल्के से हिलाया जाता है’। इन्हें हटाने से वाक्य फीका लगेगा।
कला का संसार
(क) बिरजू महाराज— “कथक की पुरानी परंपरा को तो कायम रखा है। हाँ, उसके प्रस्तुतीकरण में बदलाव किए हैं।” इस कथन को ध्यान में रखते हुए लिखिए कि कथक की प्रस्तुतियों में किस प्रकार के परिवर्तन आए हैं?
पहले कथक मंदिरों तक सीमित और फर्श पर चाँदनी बिछाकर चारों ओर दर्शकों के बीच होता था, श्रृंगार चंदनलेप और पान से होता था। नर्तक कथा का लंबा-विस्तृत वर्णन करते थे, जैसे गोपियों का घड़ा उठाना और कृष्ण का कंकड़ मारना पूरा दिखाते थे। अब मंच पर प्रस्तुति होती है, खड़े होने का नया अंदाज और भाव-भंगिमाएँ जोड़ी गई हैं, टैगोर-त्यागराज जैसे आधुनिक कवियों की रचनाओं पर कथक बनाया जाता है और ‘पनघट की गत देखो’ कहकर बाकी दर्शक की कल्पना पर छोड़ दिया जाता है।
(ख) लोकनृत्य और शास्त्रीय नृत्य में क्या अंतर है? लिखिए।
लोक नृत्य सामूहिक होता है, लोग दिनभर की मेहनत के बाद थकान दूर करने और मनोरंजन के लिए मिलकर नाचते हैं, यह अपने आनंद के लिए होता है और क्षेत्र की संस्कृति दिखाता है। शास्त्रीय नृत्य में एक नर्तक अकेला ही काफी होता है, यह दर्शकों के लिए होता है, इसके नियम, लय और भाव निश्चित होते हैं। पहले कथावाचक लोक नर्तक था, धीरे-धीरे उसकी शैली निश्चित होकर शास्त्रीय बन गई।
(ग) “बैरगिया नाला जुलुम जोर, नौ कथिक नचावें तीन चोर। जब तबला बोले धीन-धीन, तब एक-एक पर तीन-तीन।” इस पाठ में हरिया गाँव में गाए जाने वाले उपर्युक्त पद का उल्लेख है। आप अपने क्षेत्र में गाए जाने वाले किसी लोकगीत को कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
यह कार्य विद्यार्थी अपने क्षेत्र के अनुसार करेगा। उदाहरण — हमारे क्षेत्र में फसल कटाई पर गाया जाने वाला लोकगीत: ‘झूला झूलो हे किसान, खेत लहरे धान’ — जिसे ढोलक और मंजीरे पर गाया जाता है और सभी मिलकर नाचते हैं। विद्यार्थी अपने दादा-दादी या शिक्षक से ऐसा ही कोई लोकगीत सीखकर कक्षा में लय-ताल के साथ प्रस्तुत कर सकता है और उसका अर्थ भी बता सकता है।
साक्षात्कार की रचना
(क) साक्षात्कार से पहले क्या-क्या तैयारियाँ की गई होंगी?
साक्षात्कार से पहले बच्चों ने बिरजू महाराज के जीवन, कथक के इतिहास, घरानों, उनके गुरुओं और प्रसिद्ध प्रस्तुतियों के बारे में शोध किया होगा। प्रश्नों की सूची बनाई होगी, क्रम तय किया होगा, कैमरा, माइक और नोटबुक तैयार की होगी और समय व स्थान की अनुमति ली होगी। साथ ही शिष्टाचार और धैर्य के साथ कैसे प्रश्न पूछने हैं, इसका अभ्यास किया होगा।
(ख) आप इस साक्षात्कार में और क्या-क्या प्रश्न जोड़ना चाहेंगे?
मैं जोड़ना चाहूँगा — आप रियाज़ के लिए दिन में कितना समय देते थे? आपका सबसे यादगार मंच कौन सा रहा? विदेशी दर्शकों की प्रतिक्रिया कैसी रहती थी? नए learners के लिए आपका संदेश क्या है? क्या आपने कभी कथक में किसी नए वाद्य का प्रयोग किया? ये प्रश्न उनके अनुभव और सलाह को और गहराई से सामने लाएँगे।
(ग) यह साक्षात्कार एक सुप्रसिद्ध कलाकार का है। यदि आपको किसी सब्जी विक्रेता, रिक्शा चालक, घरेलू सहायक या सहायिका का साक्षात्कार लेना हो तो आपके प्रश्न किस प्रकार के होंगे?
प्रश्न उनके जीवन और श्रम से जुड़े, सरल और सम्मानजनक होंगे, जैसे — आप यह काम कब से कर रहे हैं? दिनचर्या कैसी रहती है? किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है? परिवार और भविष्य की क्या आशाएँ हैं? सरकार या समाज से क्या सहायता चाहते हैं? ग्राहकों का व्यवहार कैसा रहता है? ऐसे प्रश्नों से उनके परिश्रम और जीवन-संघर्ष को समझा जा सकता है।
सृजन
(क) आपके विद्यालय में कथक नृत्य का आयोजन होने जा रहा है। आप दर्शकों को कथक नृत्यकला के बारे में क्या-क्या बताएँगे? लिखिए।
मैं बताऊँगा कि कथक उत्तर भारत का शास्त्रीय नृत्य है, जिसका अर्थ कथावाचक है। यह ब्रज की रासलीला से जुड़ा है और महाभारत-रामायण में भी इसका उल्लेख है। इसके तीन प्रसिद्ध घराने लखनऊ, जयपुर और बनारस हैं। इसमें घुंघरू, तबला, हारमोनियम की संगत, कोमल गर्दन-हाथ की भाव-भंगिमा, चक्कर और जुगलबंदी मुख्य आकर्षण हैं। यह लय, अनुशासन और कहानी कहने की कला है।
(ख) इस कार्यक्रम की सूचना देने के लिए एक विज्ञापन तैयार कीजिए।
विज्ञापन: — ‘आइए, कथक की छटा देखें! राजकीय माध्यमिक विद्यालय में दिनांक 15 अगस्त को शाम 5 बजे प्रसिद्ध कथक दल द्वारा ‘कृष्ण-लीला’ प्रस्तुति। मुख्य अतिथि — प्राचार्य महोदय। प्रवेश निःशुल्क। सभी सादर आमंत्रित हैं। संपर्क: सांस्कृतिक समिति।’ इसमें तिथि, समय, स्थान, विषय और आमंत्रण स्पष्ट होगा और आकर्षक चित्र व रंगों से सजाया जाएगा।
(ग) यदि इस नृत्य कार्यक्रम में कोई दृष्टिबाधित दर्शक है और वह नृत्य का आनंद लेना चाहे तो इसके लिए विद्यालय की ओर से क्या व्यवस्था की जानी चाहिए?
उनके लिए आगे की पंक्ति में बैठने की व्यवस्था, ऑडियो विवरण — यानी एक व्यक्ति द्वारा नृत्य की भाव-भंगिमा और कहानी का वर्णन सुनाना, ब्रेल में कार्यक्रम पुस्तिका, स्पर्श से घुंघरू और वाद्य महसूस कराने की सुविधा और स्वयंसेवक की सहायता होनी चाहिए ताकि वे संगीत, ताल और वर्णन से नृत्य का आनंद ले सकें।
आज की पहेली
एक विद्यार्थी ने अपनी डायरी में अपने विद्यालय के किसी एक दिन का उल्लेख किया है। उस उल्लेख में संगीत की कुछ तालों के नाम आए हैं। आप उन तालों के नाम ढूँढ़िए— कल हमारे विद्यालय में संगीत और नृत्य सभा का आयोजन हुआ था। उसमें एक-दो नहीं बल्कि चार कलाकार आए थे। उन कलाकारों में एक का नाम रूपक और दूसरे का नाम लक्ष्मी था। शेष दो कलाकारों के नाम पता नहीं चल पाए। वे दोनों जब अपनी प्रस्तुति के लिए मंच पर आए तो दर्शकों से पूछने लगे— “तिलवाड़ा, दादरा या झूमरा?” दर्शक बोले— “तीनों में से कोई नहीं। हमें दीपचंदी और कहरवा पसंद है।” अब नीचे दी गई शब्द पहेली में से संगीत की उन तालों के नाम ढूँढ़कर लिखिए।
डायरी के उल्लेख में छिपे तालों के नाम हैं — रूपक, तिलवाड़ा, दादरा, झूमरा, दीपचंदी और कहरवा। शब्द पहेली के जाल में भी यही नाम अलग-अलग दिशाओं में छिपे हैं। ये सभी हिंदुस्तानी संगीत की प्रसिद्ध तालें हैं — जैसे रूपक 7 मात्रा की, दादरा 6 मात्रा की, कहरवा 8 मात्रा की ताल होती है। विद्यार्थी इन्हें पंक्तियों में ढूँढ़कर घेर सकता है।
साझी समझ
अभी आपने शास्त्रीय नृत्यों को निकटता से जाना समझा। पाँच-पाँच विद्यार्थियों के समूह में भारत के लोक नृत्यों की सूची बनाइए और उनकी विशिष्टताओं का पता लगाइए। नीचे दिए गए भारत के मानचित्र में राज्यानुसार शास्त्रीय एवं लोक नृत्य दर्शाइए।
समूह कार्य: विद्यार्थी पाँच-पाँच के समूह में लोक नृत्यों की सूची बनाएँ — जैसे भांगड़ा (पंजाब), गरबा-डांडिया (गुजरात), लावणी (महाराष्ट्र), बिहू (असम), छऊ (झारखंड/पश्चिम बंगाल), घूमर (राजस्थान), लावणी, कालबेलिया, पंडवानी आदि। प्रत्येक की वेशभूषा, अवसर जैसे फसल कटाई या उत्सव, वाद्य और गति की विशेषता नोट करें। फिर भारत के मानचित्र में राज्य के अनुसार शास्त्रीय नृत्य जैसे कथक (उत्तर प्रदेश), भरतनाट्यम (तमिलनाडु), कथकली-मोहिनीअट्टम (केरल), ओडिसी (ओडिशा), मणिपुरी (मणिपुर), कुचिपुड़ी (आंध्र प्रदेश) और साथ-साथ लोक नृत्य के नाम लिखकर रंगों से दर्शाएँ।


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