हरिद्वार
Class 8 Hindi · मल्हार · Chapter 4
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The story in short
यह पाठ आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा सन 1871 में "कविवचन सुधा" पत्रिका के संपादक के नाम लिखे गए पत्र के रूप में एक यात्रा-वृत्तांत है, जिसमें उनकी हरिद्वार-यात्रा का रोचक और चित्रात्मक वर्णन है। लेखक हरिद्वार की प्राकृतिक सुंदरता पर मुग्ध हैं — तीन ओर हरे-भरे पर्वतों से घिरी यह भूमि, हरी-भरी लताएँ, तपस्या करते-से खड़े विशाल वृक्ष, और चहचहाते पक्षी। वे सुंदर उपमाओं का प्रयोग करते हैं, जैसे लताओं की तुलना सज्जनों के शुभ मनोरथों से और वृक्षों की साधुओं से करना। "सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं" कहकर वे फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप देते हैं। गंगा के अत्यंत शीतल और मीठे जल, हर की पैड़ी घाट, नील धारा तथा कनखल, विल्व पर्वत आदि पाँच प्रमुख तीर्थों का उल्लेख करते हैं। संतोषी पंडों, सादगी और आत्मनिर्भरता पर भी वे टिप्पणी करते हैं — गंगा-तट पर पत्थर पर बैठकर किया गया भोजन उन्हें सोने की थाली के भोजन से बढ़कर लगा। पत्र की भाषा लगभग डेढ़ सौ वर्ष पुरानी हिंदी है, जो सरल, चित्रात्मक और साहित्यिक है। पूरे वर्णन में लेखक की प्रकृति-प्रेम और आध्यात्मिक शांति की अनुभूति झलकती है।


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