अठारहवीं सदी के कवि गिरिधर कविराय अपनी नीतिपरक कुंडलियों के लिए प्रसिद्ध हैं, जो जन-मानस में कहावतों की तरह प्रचलित हो गई हैं। इस पाठ में दो कुंडलियाँ दी गई हैं। पहली कुंडली का संदेश है — "बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछिताय।" अर्थात जो व्यक्ति बिना सोचे-समझे कोई काम करता है, वह बाद में पछताता है; उसका अपना काम बिगड़ जाता है, संसार में उसकी हँसी होती है, मन में चैन नहीं रहता और खान-पान, सम्मान तथा राग-रंग भी उसे अच्छे नहीं लगते। बिना विचारे किया गया कार्य लंबे समय तक मन में खटकता रहता है। दूसरी कुंडली कहती है — "बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ।" अर्थात बीती हुई बातों को भुलाकर भविष्य की चिंता करनी चाहिए और जो सहज में बन पड़े उसी में मन लगाना चाहिए, ताकि कोई दुर्जन हँस न सके और मन में किसी प्रकार का दोष न रहे। कवि मन को यह विश्वास दिलाने की सलाह देते हैं कि "जो बीत गई सो बीत गई।" दोनों कुंडलियाँ विवेकपूर्ण निर्णय, सकारात्मक सोच और आगे बढ़ते रहने का व्यावहारिक जीवन-दर्शन सरल भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
The story in 6 beats
1पहली कुंडलिया कहती है कि बिना सोचे काम करने वाला बाद में पछताता है और उसका काम बिगड़ जाता है।
2ऐसे काम से जग हँसता है, मन को चैन नहीं मिलता और अच्छी चीजें भी मन को नहीं भातीं।
3कवि कहता है कि बिना विचार किए काम का दुख आसानी से नहीं जाता और वह मन में खटकता रहता है।
4दूसरी कुंडलिया सलाह देती है कि बीती बातों को छोड़कर आगे की सुधि लेनी चाहिए।
5मन को उसी काम में लगाना चाहिए जो सहज बन सके, ताकि दुर्जन न हँसें और मन में खता न रहे।
6अंत में कवि समझाता है कि भविष्य के सुख को समझकर बीती बात को बीती मानकर आगे बढ़ना चाहिए।
कुंडलिया छंदबिना विचारे कार्य का परिणामबीती बात को भुलानाविवेक और सकारात्मक सोचनीति-काव्य
Characters & key ideas
ककुंडलियाछह पंक्तियों का एक छंद जिसमें पहली पंक्ति का पहला/दूसरा शब्द ही अंतिम शब्द भी होता है; दोहा और रोला से मिलकर बनता है।
बबिना बिचारेबिना सोचे-समझे; ऐसा कार्य जो पछतावे का कारण बनता है — पहली कुंडली का मुख्य भाव।
ननीतिपरक पदजीवन-व्यवहार और सदाचरण की सीख देने वाली रचनाएँ, जो प्रायः कहावत बन जाती हैं।
बबीती ताहि बिसारि देबीती बातों को भुलाकर भविष्य की सुधि लेने की सीख — दूसरी कुंडली का मुख्य भाव।
वविवेकसही और गलत में अंतर करके सोच-समझकर निर्णय लेने की शक्ति, जिस पर कुंडलियाँ बल देती हैं।
गगिरिधर कविरायअठारहवीं सदी के कवि, जो लोकनीति और घर-गृहस्थी की बातें सरल शब्दों में कहने वाली कुंडलियों के लिए प्रसिद्ध हैं।
Word meanings · शब्दार्थ
बिचारे
सोच-विचार
पाछे
बाद में
हँसाय
हँसी का कारण बनना
चित
मन
राग रंग
मौज-मस्ती
टरत न टारे
टालने से भी नहीं टलता
खटकत
चुभता रहता
बिसारि
भुलाकर
सुधि
ध्यान
सहज
आसानी से
दुर्जन
बुरा व्यक्ति
खता
दोष या गलती
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गिरिधर कविराय की कुंडलियाँ
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