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तरुण के स्वप्न — Class 8 Hindi

मल्हार · Chapter 10

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Chapter summary

यह पाठ नेताजी सुभाषचंद्र बोस के उस प्रेरक उद्बोधन का अंश है जो उन्होंने 29 दिसंबर, 1929 को मेदिनीपुर जिला युवक-सम्मेलन में युवाओं को संबोधित करते हुए दिया था। नेताजी अपने राजनीतिक गुरु देशबंधु चित्तरंजन दास के स्वप्न के उत्तराधिकारी के रूप में अपना स्वप्न युवा पीढ़ी को सौंपते हैं। वे एक नए, सर्वांगीण स्वाधीन और संपन्न समाज तथा उस पर एक स्वाधीन राष्ट्र का सपना देखते हैं। उनके आदर्श समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो और समाज के दबाव से न मरे; जातिभेद का कोई स्थान न हो; नारी पुरुष के समान अधिकार का उपभोग करे और राष्ट्र-सेवा में समान भागीदार बने; अर्थ की विषमता न हो; और प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा तथा उन्नति का समान अवसर मिले। उस समाज में श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा होगी और आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा। नेताजी कहते हैं कि इस स्वप्न को सार्थक बनाने के लिए हर त्याग किया जा सकता है, हर संकट सहा जा सकता है और इसके लिए प्राण देना भी "मरण है स्वर्ग समान" है। अंत में वे यह स्वप्न अपने तरुण भाइयों को उपहारस्वरूप देते हैं और उन्हें स्वीकार करने को कहते हैं।
स्वाधीन-संपन्न राष्ट्र का स्वप्नसमानता और नारी-अधिकारश्रम एवं कर्म की मर्यादायुवाओं को आह्वान

Key ideas & terms

स्वाधीन-संपन्न समाज
नेताजी का स्वप्न — एक ऐसा सर्वांगीण स्वाधीन और समृद्ध समाज जिस पर एक स्वतंत्र राष्ट्र स्थापित हो।
उत्तराधिकारी
किसी के स्वप्न या उद्देश्य को आगे बढ़ाने का दायित्व वहन करने वाला; युवा देशबंधु व नेताजी के स्वप्नों के उत्तराधिकारी हैं।
नारी-समानता
नेताजी के आदर्श समाज में नारी मुक्त होकर पुरुष के समान अधिकार का उपभोग करे और राष्ट्र-सेवा में समान भागीदार बने।
श्रम की मर्यादा
समाज में परिश्रम और कर्म का पूरा सम्मान, जहाँ आलसी और अकर्मण्य व्यक्ति के लिए कोई स्थान नहीं।
उद्बोधन
किसी समूह को जागरूक और प्रेरित करने के लिए दिया गया प्रेरक भाषण; यह पाठ ऐसा ही एक उद्बोधन है।
सुभाषचंद्र बोस
महान स्वतंत्रता सेनानी "नेताजी" (आजाद हिंद फौज के नायक), जिन्होंने "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा" का नारा दिया।

Extra questions & answers

नेताजी ने यह उद्बोधन कब और कहाँ दिया था?

यह उद्बोधन 29 दिसंबर, 1929 को मेदिनीपुर जिला युवक-सम्मेलन में युवाओं को संबोधित करते हुए दिया गया था।

"उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं" में "हम" किसके लिए है?

यहाँ "हम" देश के तरुण/युवा वर्ग के लिए है, जिन्हें नेताजी अपने और देशबंधु चित्तरंजन दास के स्वप्न का उत्तराधिकारी मानते हैं।

नेताजी ने किस प्रकार के राष्ट्र का स्वप्न देखा था?

उन्होंने एक नए, सर्वांगीण स्वाधीन और संपन्न समाज तथा उस पर एक स्वाधीन राष्ट्र का स्वप्न देखा, जो विश्व के समक्ष आदर्श हो।

नेताजी के आदर्श समाज में नारी का स्थान कैसा होगा?

उस समाज में नारी मुक्त होकर पुरुष के समान अधिकार का उपभोग करेगी और समाज तथा राष्ट्र की सेवा में समान रूप से भागीदार बनेगी।

"आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा" — नेताजी ने ऐसा क्यों कहा?

क्योंकि वे श्रम और कर्म की मर्यादा वाले समाज की कल्पना करते थे; राष्ट्र-निर्माण परिश्रमी और कर्मठ लोगों से ही संभव है।

स्वाधीन राष्ट्र का स्वप्न किन बातों से साकार होगा?

जातिभेद की समाप्ति, अर्थ की समानता, सबको शिक्षा व उन्नति के समान अवसर तथा श्रम और कर्म की मर्यादा से यह स्वप्न साकार होगा।

नेताजी ने इस स्वप्न को अपने जीवन में किस रूप में देखा?

उन्होंने इसे नित्य एवं अखंड सत्य माना, जिसके लिए हर त्याग और संकट सहा जा सकता है तथा प्राण देना भी "स्वर्ग समान मरण" है।

नेताजी ने अंत में युवाओं को क्या दिया?

उन्होंने अपना स्वप्न ही युवाओं को उपहारस्वरूप दिया और कहा कि वे इसे स्वीकार करें तथा इसे साकार करने का दायित्व निभाएँ।

पाठ का शीर्षक "तरुण के स्वप्न" क्यों रखा गया है?

क्योंकि नेताजी अपना स्वप्न तरुणों (युवाओं) को सौंपते हैं और चाहते हैं कि युवा पीढ़ी ही इसे पूरा करे, इसलिए यह शीर्षक उपयुक्त है।

आज की युवा पीढ़ी नेताजी के स्वप्न को कैसे पूरा कर सकती है?

समानता, शिक्षा, परिश्रम और राष्ट्र-सेवा के मूल्यों को अपनाकर, जातिभेद व विषमता मिटाकर तथा कर्मठता से देश के निर्माण में योगदान देकर युवा यह स्वप्न पूरा कर सकते हैं।

मेरी समझ से

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं। (1) “उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं।” इस कथन में रेखांकित शब्द ‘हम’ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है? • सुभाषचंद्र बोस के लिए • देश के तरुण वर्ग के लिए • चित्तरंजन दास के लिए • भारतवासियों के लिए

इस कथन में ‘हम’ का अर्थ है देश के तरुण वर्ग के लिए। नेताजी ने यह भाषण मेदिनीपुर जिला युवक-सम्मेलन में युवाओं को संबोधित करते हुए दिया था और कहा था कि देशबंधु चित्तरंजन दास के स्वप्न के उत्तराधिकारी आज के युवा हैं। साथ ही व्यापक अर्थ में इसमें भारतवासियों का नया तरुण समाज भी सम्मिलित है, पर प्रत्यक्ष संबोधन तरुण वर्ग को है।

(क) (2) स्वाधीन राष्ट्र का स्वप्न साकार होगा? • आर्थिक असमानता से • स्त्री-पुरुष के भिन्न अधिकारों से • श्रम और कर्म की मर्यादा से • जातिभेद से

स्वाधीन राष्ट्र का स्वप्न श्रम और कर्म की मर्यादा से साकार होगा। पाठ में नेताजी कहते हैं कि जिस समाज में श्रम और कर्म को सम्मान मिलेगा और हर व्यक्ति को समान अवसर मिलेगा, वही समाज स्वाधीन राष्ट्र की नींव बनेगा। आर्थिक असमानता, भिन्न अधिकार और जातिभेद इस स्वप्न के बाधक हैं।

(क) (3) “उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं।” ‘उत्तराधिकारी’ होने से क्या अभिप्राय है? • हमें उनके स्वप्नों को संजोकर रखना है • हमें भी उनकी तरह स्वप्न देखने का अधिकार है • उनके स्वप्नों को पूरा करने के लिए हमें ही कर्म करना है • उनके स्वप्नों पर चर्चा करने का दायित्व हमारा ही है

‘उत्तराधिकारी’ होने का अभिप्राय है कि उनके स्वप्नों को पूरा करने के लिए हमें ही कर्म करना है। केवल संजोकर रखना या चर्चा करना पर्याप्त नहीं है, हमें उनके आदर्शों को अपने जीवन और कर्म से साकार करना है।

(क) (4) जब प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा और उन्नति का समान अवसर प्राप्त होगा तब— • राष्ट्र की श्रम-शक्ति बढ़ेगी • तरुणों का साहस बढ़ेगा • राष्ट्र स्वाधीन बनेगा • राष्ट्र स्वप्नदर्शी होगा

जब प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा और उन्नति का समान अवसर मिलेगा तब राष्ट्र स्वाधीन बनेगा और उसकी श्रम-शक्ति भी बढ़ेगी। समान अवसर से योग्यता का विकास होगा, समाज में समानता आएगी और राष्ट्र आत्मनिर्भर तथा विजातीय प्रभाव से मुक्त हो सकेगा।

(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?

यह कक्षा-चर्चा का कार्य है। प्रत्येक छात्र अपने चुने हुए उत्तर के पक्ष में पाठ के आधार पर तर्क देगा, जैसे ‘हम’ शब्द नेताजी ने युवाओं के लिए कहा क्योंकि श्रोता युवा थे, और श्रम की मर्यादा ही राष्ट्र निर्माण का आधार है। चर्चा से सभी को पाठ की गहरी समझ बनेगी और अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आएँगे।

मिलकर करें मिलान

“इसी स्वप्न की प्रेरणा से हम उठते हैं, बैठते हैं, चलते हैं, फिरते हैं और लिखते हैं, भाषण देते हैं, काम-काज करते हैं।”

हमारी समूची दिनचर्या और आचार-विचार इसी लक्ष्य (स्वप्न) की प्राप्ति पर केंद्रित हैं।

“जो राष्ट्र हमारे स्वदेशी समाज के यंत्र के रूप में काम करेगा, सर्वोपरि वह समाज और राष्ट्र भारतवासियों का अभाव मिटाएगा।”

जिस देश की योजनाएँ हमारे अपने समाज को ध्यान में रखकर बनाई जाएँगी, उस देश में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं होगा।

“उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो तथा समाज के दबाव से वह मरे नहीं।”

समाज में सभी व्यक्तियों को सभी तरह की स्वतंत्रता हो और उस पर किसी तरह का बंधन या सामाजिक दबाव न हो।

पंक्तियों पर चर्चा

(क) “उस समाज में अर्थ की विषमता न हो।”

इसका अर्थ है कि समाज में धन-संपत्ति का असमान बँटवारा न हो। किसी के पास बहुत अधिक और किसी के पास बहुत कम न हो। सभी को अपनी मेहनत का उचित फल मिले और गरीबी-अमीरी की खाई समाप्त हो, तभी समानता और न्याय स्थापित होगा।

(ख) “वही स्वप्न उनकी शक्ति का उत्स बना और उनके आनंद का निर्झर रहा।”

इसका अर्थ है कि देशबंधु चित्तरंजन दास ने जो स्वाधीन और आदर्श समाज का स्वप्न देखा था, वही उनके काम करने की शक्ति का स्रोत था और उसी से उन्हें सच्चा आनंद मिलता था। बड़े लक्ष्य से व्यक्ति को निरंतर काम करने की प्रेरणा और खुशी मिलती है।

(ग) “उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो।”

इसका अर्थ है कि व्यक्ति सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक हर प्रकार के शोषण, भेदभाव और दबाव से मुक्त हो। वह अपनी क्षमता के अनुसार स्वतंत्र रूप से सोच, बोल और काम कर सके और समाज उसे आगे बढ़ने का अवसर दे।

सोच-विचार के लिए

(क) नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने किस प्रकार के राष्ट्र निर्माण का स्वप्न देखा था?

नेताजी ने एक नए सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज और उस पर आधारित स्वाधीन राष्ट्र का स्वप्न देखा था जहाँ व्यक्ति हर दृष्टि से मुक्त हो, जातिभेद न हो, नारी को पुरुष के समान अधिकार मिले, आर्थिक विषमता न हो, सभी को शिक्षा और उन्नति का समान अवसर मिले, श्रम का सम्मान हो और राष्ट्र विजातीय प्रभाव से पूर्णतः मुक्त हो।

(ख) नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने किस लक्ष्य की प्राप्ति को अपने जीवन की सार्थकता के रूप में देखा?

नेताजी ने अपने स्वप्न की प्रतिष्ठा को ही जीवन की सार्थकता माना। उन्होंने कहा कि इस सत्य की स्थापना के लिए सब कुछ त्यागा जा सकता है, हर संकट सहा जा सकता है और यदि इस स्वप्न को साकार करने में प्राण भी देना पड़े तो वह मरण स्वर्ग के समान है।

(ग) “आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा” सुभाषचंद्र बोस ने ऐसा क्यों कहा होगा?

क्योंकि उनका आदर्श समाज श्रम और कर्म पर आधारित था। उनका मानना था कि राष्ट्र का निर्माण परिश्रमी लोगों से होता है। आलस्य और अकर्मण्यता समाज को कमजोर बनाती है, इसलिए ऐसे समाज में जो मेहनत नहीं करेगा, उसके लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

(घ) नेताजी सुभाषचंद्र बोस के लक्ष्यों या ध्येय को पूरा करने के लिए आज की युवा पीढ़ी क्या-क्या कर सकती है?

आज की युवा पीढ़ी अच्छी शिक्षा प्राप्त कर, जातिभेद और लिंग भेद को दूर कर, मेहनत और ईमानदारी से काम करके, स्वदेशी वस्तुओं को अपनाकर, नारी समानता का समर्थन करके, गरीबी और अशिक्षा के विरुद्ध काम करके और देश सेवा के लिए एकजुट होकर नेताजी के स्वप्न को पूरा कर सकती है।

अनुमान और कल्पना से

(क) “उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो”, सुभाषचंद्र बोस ने किन-किन दृष्टियों से मुक्ति की बात की होगी?

वे सामाजिक दृष्टि से जातिभेद और ऊँच-नीच से, आर्थिक दृष्टि से गरीबी और विषमता से, राजनीतिक दृष्टि से पराधीनता और विजातीय प्रभाव से, वैचारिक दृष्टि से अंधविश्वास और असमान अवसर से तथा व्यक्तिगत दृष्टि से सामाजिक दबाव और शोषण से मुक्ति की बात कर रहे थे।

(ख) “उस समाज में नारी मुक्त होकर समाज एवं राष्ट्र के पुरुषों की तरह समान अधिकार का उपभोग करे”, सुभाषचंद्र बोस को अपने भाषण में नारी के लिए समान अधिकारों की बात क्यों कहनी पड़ी?

क्योंकि उस समय समाज में नारी को शिक्षा, काम और निर्णय में पुरुषों के समान अधिकार नहीं मिलते थे। पर्दा प्रथा, अशिक्षा और भेदभाव के कारण वे राष्ट्र निर्माण में पूरी भागीदारी नहीं कर पाती थीं। इसलिए नेताजी ने समान अधिकार की आवश्यकता पर जोर दिया।

(ग) आपके विचार से हमारे समाज में और कौन-कौन से लोग हैं जिन्हें विशेष अधिकार दिए जाने की आवश्यकता है?

हमारे समाज में दिव्यांगजन, अनुसूचित जाति-जनजाति के लोग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, वृद्धजन, अनाथ बच्चे और दूर-दराज के आदिवासी समुदाय जैसे लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और प्रतिनिधित्व में विशेष सहायता और आरक्षण की आवश्यकता है ताकि वे मुख्यधारा में आ सकें।

(घ) सुभाषचंद्र बोस देश के समस्त युवा वर्ग को संबोधित करते हुए कहते हैं— “हे मेरे तरुण भाइयो!” उनका संबोधन केवल ‘भाइयो’ शब्द तक ही क्यों सीमित रहा होगा?

यह संबोधन 1929 के युवक सम्मेलन में उपस्थित मुख्य श्रोताओं के संदर्भ में था, जहाँ अधिकतर युवा पुरुष उपस्थित थे। साथ ही उस समय ‘भाइयो’ शब्द का प्रयोग सामान्य संबोधन के रूप में सभी युवाओं के लिए किया जाता था। आज हम इसे ‘भाइयो और बहनो’ कहकर अधिक समावेशी बनाते हैं।

(ङ) “यह स्वप्न मैं तुम्हें उपहारस्वरूप देता हूँ— स्वीकार करो।” सुभाषचंद्र बोस के इस आह्वान पर श्रोताओं (युवा वर्ग) की क्या प्रतिक्रिया रही होगी?

श्रोता युवाओं में उत्साह और जोश भर गया होगा। उन्होंने तालियों और जय-जयकार से स्वप्न को स्वीकार किया होगा और संकल्प लिया होगा कि वे कठोर परिश्रम, त्याग और एकता से इस स्वाधीन संपन्न समाज और राष्ट्र के स्वप्न को साकार करेंगे।

शीर्षक

(क) आपने नेताजी सुभाषचंद्र बोस के भाषण का एक अंश पढ़ा है, इसे ‘तरुण के स्वप्न’ शीर्षक दिया गया है। अपने समूह में चर्चा करके लिखिए कि यह शीर्षक क्यों दिया गया होगा?

यह शीर्षक इसलिए दिया गया है क्योंकि यह भाषण तरुणों को संबोधित था और इसमें एक ऐसे आदर्श समाज और राष्ट्र का स्वप्न रखा गया है जिसे पूरा करने की जिम्मेदारी तरुणों को सौंपी गई है। यह भविष्य के निर्माता तरुणों के लिए प्रेरणा और दिशा है।

(ख) यदि आपको भाषण के इस अंश को कोई अन्य नाम देना हो तो क्या नाम देंगे? आपने यह नाम क्यों सोचा? यह भी लिखिए।

मैं इसे ‘स्वाधीन भारत का संकल्प’ नाम देना चाहूँगा क्योंकि इसमें केवल सपना नहीं बल्कि स्वतंत्र, समतामूलक और कर्मनिष्ठ राष्ट्र बनाने का संकल्प और त्याग की भावना व्यक्त की गई है। यह नाम उसके लक्ष्य को स्पष्ट करता है।

(ग) सुभाषचंद्र बोस ने अपने समय की स्थितियों या समस्याओं को अपने संबोधन में स्थान दिया है। यदि आपको अपनी कक्षा को संबोधित करने का अवसर मिले तो आप किन-किन विषयों को अपने उद्बोधन में सम्मिलित करेंगे और उसका क्या शीर्षक रखेंगे?

मैं अपने उद्बोधन में स्वच्छ विद्यालय, अनुशासन, पढ़ाई के साथ खेल, पर्यावरण संरक्षण, मोबाइल का सही उपयोग, एक-दूसरे की सहायता और नारी-समानता जैसे विषय रखूँगा। इसका शीर्षक रखूँगा ‘हमारी कक्षा, हमारा भविष्य’।

भाषा की बात

(क) सुभाषचंद्र बोस ने अपने भाषण में संख्या, संगठन या भाव आदि का बोध कराने वाले शब्दों के साथ उनकी विशेषता अथवा गुण बताने वाले शब्दों का प्रयोग किया है। उनके भाषण से विशेषता अथवा गुण बताने वाले शब्द ढूँढ़कर दिए गए शब्द समूह को पूरा कीजिए— अखंड ___ सत्य, ___ समाज, ___ राष्ट्र, ___ जीवन, ___ शक्ति, ___ आनंद

पाठ के आधार पर शब्द समूह इस प्रकार पूरे होंगे: अखंड सत्य, सर्वांगीण (स्वाधीन संपन्न) समाज, स्वाधीन राष्ट्र, क्षुद्र जीवन, असीम शक्ति, अपार आनंद। ये सभी विशेषण नेताजी ने अपने स्वप्न के वर्णन में प्रयोग किए हैं।

(ख) सुभाषचंद्र बोस ने तो उपर्युक्त विशेषताओं के साथ इन शब्दों को रखा है। आप किन विशेषताओं के साथ इन उपर्युक्त शब्दों को रखना चाहेंगे और क्यों? लिखिए।

मैं ‘सत्य’ के साथ ‘शाश्वत सत्य’, ‘समाज’ के साथ ‘समावेशी समाज’, ‘राष्ट्र’ के साथ ‘विकसित राष्ट्र’, ‘जीवन’ के साथ ‘सार्थक जीवन’, ‘शक्ति’ के साथ ‘सकारात्मक शक्ति’ और ‘आनंद’ के साथ ‘साझा आनंद’ कहना चाहूँगा क्योंकि आज हमें सत्य की निरंतरता, सबको साथ लेकर चलना, विकास, जीवन की उपयोगिता और मिल-जुलकर खुशी की आवश्यकता है।

विपरीतार्थक शब्द और उनके प्रयोग

स्वीकार

अस्वीकार

सार्थक

निरर्थक

विषमता

समानता

क्षुद्र

विशाल / वृहत / विराट / महान

संपन्न

विपन्न

अकर्मण्य

कर्मण्य / कर्मठ

मरण

जीवन

(ख) अब स्तंभ 1 और स्तंभ 2 के सभी शब्दों से दिए गए उदाहरण के अनुसार वाक्य बनाकर लिखिए, जैसे— “समाज की उन्नति अकर्मण्य नहीं अपितु कर्मण्य व्यक्तियों पर निर्भर है।”

1. सच्चे मित्र की सलाह को स्वीकार करना चाहिए, अस्वीकार नहीं। 2. परिश्रम का सार्थक परिणाम मिलता है, निरर्थक मेहनत से कुछ नहीं मिलता। 3. समाज में विषमता को दूर कर समानता लानी चाहिए। 4. क्षुद्र सोच वाले व्यक्ति महान कार्य नहीं कर पाते, विशाल हृदय वाले ही देश सेवा करते हैं। 5. संपन्न परिवारों का कर्तव्य है कि वे विपन्न लोगों की सहायता करें। 6. आलसी अकर्मण्य व्यक्ति से कोई काम नहीं होता, कर्मठ व्यक्ति ही सफल होता है। 7. सैनिकों ने मरण को भी जीवन से अधिक गौरवपूर्ण माना।

आपकी बात

(क) आपने सुभाषचंद्र बोस के स्वप्न के बारे में जाना। आप अपने विद्यालय, राज्य और देश के बारे में कैसे स्वप्न देखते हैं? लिखिए।

मैं अपने विद्यालय को स्वच्छ, पुस्तकालय और प्रयोगशाला से संपन्न, जहाँ सभी को खेल और पढ़ाई का समान अवसर मिले, ऐसा देखना चाहता हूँ। अपने राज्य को हरियाली और रोजगार से भरपूर और अपने देश को शिक्षित, स्वस्थ, भेदभाव-मुक्त और विज्ञान-तकनीक में आगे बढ़ता हुआ स्वाधीन और सशक्त राष्ट्र देखना चाहता हूँ।

(ख) हमें बड़े संघर्षों के बाद स्वतंत्रता मिली है। अपनी इस स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए हम अपने स्तर पर क्या-क्या कर सकते हैं? लिखिए।

हम कानून का पालन करके, मतदान में भाग लेकर, एकता और भाईचारा बनाए रखकर, देश की संपत्ति की रक्षा करके, ईमानदारी से पढ़ाई और काम करके, भ्रष्टाचार और अफवाहों से बचकर, पर्यावरण और स्वदेशी वस्तुओं को अपनाकर स्वतंत्रता को बनाए रख सकते हैं।

मिलान कीजिए

8 अप्रैल, 1929 को ‘सेंट्रल असेंबली’ में बम फेंकने वाले क्रांतिकारी, ‘शहीद-ए-आज़म’ के नाम से जाने जाते हैं।

भगत सिंह

‘स्वराज पार्टी’ के संस्थापकों में से एक, सुभाषचंद्र बोस के राजनीतिक गुरु कहे जाते हैं।

चित्तरंजन दास

जेल में क्रांतिकारियों के साथ राजबंदियों के समान व्यवहार न होने के कारण क्रांतिकारियों ने 13 जुलाई 1929 से भूख हड़ताल शुरू कर दी। अनशन के तिरसठवें दिन जेल में इनका देहांत हो गया।

जतिन दास

इनके जन्मदिवस पर ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ मनाया जाता है।

महात्मा गाँधी

नर्मदा नदी के तट पर इनकी एक विशाल प्रतिमा स्थापित है। जिसे ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ कहा जाता है।

सरदार वल्लभभाई पटेल

1921 में असहयोग आंदोलन में गिरफ्तार होने पर न्यायाधीश ने इनसे पिता का नाम पूछा तो इन्होंने कहा— “मेरा नाम आजाद है, पिता का नाम स्वतंत्रता और पता कारावास है।”

चंद्रशेखर आजाद

(ख) इनमें से एक स्वतंत्रता सेनानी का नाम ‘तरुण के स्वप्न’ पाठ में भी आया है। उसे पहचान कर लिखिए।

चित्तरंजन दास। पाठ में नेताजी ने कहा है कि हमारे नेता स्वर्गीय देशबंधु चित्तरंजन दास ने भी एक स्वप्न देखा था और हम उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी हैं।

सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज के लिए प्रयास

नेताजी सुभाषचंद्र बोस और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने स्वाधीन संपन्न समाज की स्थापना के लिए अपने समय में अनेक प्रयास किए। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात इस दिशा में क्या-क्या उल्लेखनीय प्रयत्न किए गए हैं? अपनी सामाजिक अध्ययन की पाठ्यपुस्तक, अपने अनुभवों एवं पुस्तकालय की सहायता से लिखिए।

स्वतंत्रता के बाद संविधान में समानता, स्वतंत्रता और न्याय सुनिश्चित किया गया। शिक्षा का अधिकार, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, सर्व शिक्षा अभियान, मनरेगा, हरित क्रांति, पंचवर्षीय योजनाएँ, विज्ञान-तकनीक, इसरो, बैंक-एटीएम-यूपीआई विस्तार, और आत्मनिर्भर भारत जैसे प्रयासों से गरीबी, अशिक्षा और असमानता को कम करने तथा स्वदेशी उद्योगों को बढ़ाने का कार्य हुआ है।

स्त्री सशक्तीकरण

(क) सुभाषचंद्र बोस ने स्त्रियों के लिए समान अधिकार की बात की है। अपने अनुभवों के आधार पर बताइए कि उन्हें कौन-कौन से विशेषाधिकार राज्य की ओर से दिए गए हैं?

राज्य ने स्त्रियों को शिक्षा में समान अवसर, संपत्ति में अधिकार, नौकरियों और पंचायतों में आरक्षण, मातृत्व अवकाश, कन्या शिक्षा छात्रवृत्ति, सुकन्या समृद्धि योजना, उज्ज्वला योजना और कार्यस्थल पर सुरक्षा जैसे विशेषाधिकार दिए हैं।

(ख) सुभाषचंद्र बोस ने ‘आजाद हिंद फौज’ का नेतृत्व किया था। उसमें एक टुकड़ी स्त्रियों की भी थी। उस टुकड़ी का नाम पता लगाकर लिखिए। उस टुकड़ी की भूमिका क्या थी? यह भी बताइए।

उस टुकड़ी का नाम ‘रानी झाँसी रेजिमेंट’ था, जिसकी प्रमुख कैप्टन लक्ष्मी सहगल थीं। इस टुकड़ी ने सैन्य प्रशिक्षण लेकर युद्ध में सहयोग, घायलों की सेवा, प्रचार और देशभक्ति का प्रसार किया और यह सिद्ध किया कि महिलाएँ भी राष्ट्र रक्षा में पुरुषों के समान सक्षम हैं।

आपके प्रिय स्वतंत्रता सेनानी

आप किस स्वतंत्रता सेनानी के कार्यों व विचारों से प्रभावित हैं? कारण सहित लिखिए और अभिनय (रोल प्ले) करते हुए उनके विचारों को कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।

मैं भगत सिंह से अधिक प्रभावित हूँ क्योंकि उन्होंने युवा अवस्था में देश के लिए बलिदान दिया और शिक्षा, समानता तथा अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई। उनका नारा ‘इंकलाब जिंदाबाद’ युवाओं को आज भी प्रेरित करता है। रोल प्ले में मैं उनकी वेशभूषा में उनके विचार ‘आजादी केवल अंग्रेजों से मुक्ति नहीं, बल्कि विषमता से मुक्ति है’ प्रस्तुत करूँगा।

“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।”

स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।

बाल गंगाधर तिलक

करो या मरो

महात्मा गाँधी - भारत छोड़ो आंदोलन 1942 में दिया गया मंत्र

मैं आजाद हूँ, आजाद रहूँगा और आजाद ही मरूँगा

चंद्रशेखर आजाद

इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद

भगत सिंह और उनके साथियों द्वारा प्रसिद्ध किया गया, मूलतः हसरत मोहानी द्वारा दिया गया

पूर्ण स्वराज

पंडित जवाहरलाल नेहरू - 1929 लाहौर अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा घोषित

परियोजना कार्य

आप सभी राज्यों के स्वतंत्रता सेनानियों के विषय में पढ़कर उनमें से 10 महिला एवं 10 पुरुष स्वतंत्रता सेनानियों के चित्रों का संग्रह करके एक संग्रहिका तैयार कीजिए। चित्रों के नीचे उनके विशेष योगदान के बारे में एक-दो वाक्य भी लिखिए। अपनी संग्रहिका तैयार करते समय ध्यान रखिए कि आप किसी भी राज्य से एक से अधिक व्यक्ति न चुनें।

यह परियोजना कार्य है। छात्र प्रत्येक राज्य से एक-एक सेनानी चुनकर 10 महिलाओं जैसे रानी लक्ष्मीबाई (उत्तर प्रदेश), मैडम भीकाजी कामा (गुजरात), सरोजिनी नायडू (तेलंगाना), अरुणा आसफ अली (हरियाणा) और 10 पुरुषों जैसे तात्या टोपे (मध्य प्रदेश), खुदीराम बोस (पश्चिम बंगाल), लाला लाजपत राय (पंजाब), वीर सावरकर (महाराष्ट्र) आदि के चित्र, नाम और एक-दो वाक्यों में योगदान लिखकर सुंदर संग्रहिका बनाएँगे।

साझी समझ

उपर्युक्त पत्र में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने गृह एवं कुटीर उद्योग की बात की है। यह पत्र देश की स्वतंत्रता से पहले लिखा गया था। अपने आस-पास के गृह एवं कुटीर उद्योगों के विषय में अपने साथियों के साथ चर्चा कीजिए।

हमारे आस-पास मिट्टी के बर्तन, बाँस की टोकरी, अचार-पापड़, सिलाई-कढ़ाई, मोमबत्ती और साबुन बनाना जैसे गृह उद्योग चलते हैं। इनसे परिवारों को अतिरिक्त आय मिलती है और महिलाएँ घर पर रहकर आत्मनिर्भर बनती हैं। चर्चा में हम इनके कच्चे माल, बाजार और राज्य सहायता के बारे में जानेंगे।

खोजबीन के लिए

नीचे दी गई इंटरनेट कड़ी का प्रयोग करके आप सुभाषचंद्र बोस पर आधारित फिल्म देख सकते हैं। https://www.youtube.com/watch?v=u_zmDD54dU4 ‘आजाद हिंद फौज’ के विषय में और अधिक जानकारी जुटाइए और अपनी कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।

यह खोजबीन कार्य है। छात्र दी गई कड़ी से फ़िल्म देखकर और पुस्तकालय-इंटरनेट से जानकारी लेकर बताएंगे कि आजाद हिंद फौज का गठन 1942-43 में रासबिहारी बोस और नेताजी ने किया, इसका लक्ष्य भारत को स्वतंत्र कराना था, इसमें रानी झाँसी रेजिमेंट भी थी और ‘दिल्ली चलो’ व ‘जय हिंद’ इसके प्रमुख नारे थे।