इस अध्याय में व्याकरण की उन मूल संज्ञाओं (पारिभाषिक शब्दों) और परिभाषाओं का परिचय दिया जाता है जो आगे के व्याकरण को समझने के लिए आवश्यक हैं। इनमें ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत स्वर; गुण (अ, ए, ओ) तथा वृद्धि (आ, ऐ, औ); सवर्ण (समान उच्चारण-स्थान वाले वर्ण); संयोग (दो या अधिक व्यंजनों का मेल); तथा सर्वनाम, अव्यय आदि की परिभाषाएँ सम्मिलित हैं। इन संज्ञाओं की सहायता से पाणिनि के सूत्रों और सन्धि, प्रत्यय आदि के नियमों को संक्षेप में कहा जा सकता है। उदाहरणतः, ‘गुण’ और ‘वृद्धि’ की संज्ञाएँ सन्धि के नियमों में बार-बार प्रयुक्त होती हैं। यह अध्याय व्याकरण की एक प्रकार की ‘शब्दावली’ है, जिसे जान लेने पर शेष व्याकरण सरलता से समझ में आता है।
गुण और वृद्धिसवर्णसंयोगह्रस्व-दीर्घ-प्लुतपारिभाषिक संज्ञाएँ
Characters & key ideas
ससंज्ञाव्याकरण का पारिभाषिक शब्द/नाम।
गगुणःअ, ए, ओ — ये गुण संज्ञक स्वर हैं।
ववृद्धिःआ, ऐ, औ — ये वृद्धि संज्ञक स्वर हैं।
ससवर्णःसमान उच्चारण-स्थान और प्रयत्न वाले वर्ण।
ससंयोगःबिना स्वर के दो या अधिक व्यंजनों का मेल।
पपरिभाषाकिसी संज्ञा का स्पष्ट अर्थ बताने वाला नियम।
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व्याकरण में ‘संज्ञा’ का क्या अर्थ है?
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